Aravalli Hills Rajasthan: राजस्थान में अरावली पर्वतमाला की छोटी पहाड़ियां अनियंत्रित निर्माण, चट्टानों की कटाई और अवैध खनन के कारण पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रही हैं। अजमेर और आसपास के क्षेत्रों में आवासीय तथा व्यावसायिक निर्माण के लिए चट्टानों को हटाए जाने से प्राकृतिक भू-आकृति, वनस्पति और जलस्रोतों पर असर पड़ने की चिंता बढ़ी है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 30 से 35 वर्षों में कई इलाकों की तस्वीर बदल गई है और पहले मौजूद चट्टानी क्षेत्र सिमटते गए हैं।
अरावली पर्वतमाला केवल पहाड़ियों का समूह नहीं है। यह मिट्टी के कटाव को रोकने, भूजल के पुनर्भरण, जैव विविधता के संरक्षण और मरुस्थलीकरण के प्रभाव को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में पहाड़ियों को नुकसान पहुंचने का असर आसपास के पर्यावरण और स्थानीय जल व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
Aravalli Hills Rajasthan: अजमेर की छोटी पहाड़ियों पर संकट
अजमेर के वैशाली नगर, हरिभाऊ उपाध्याय नगर, शास्त्री नगर, एलआईसी कॉलोनी, आंतेड़, कृष्णगंज, पंचशील और लोहागल जैसे इलाकों में पहले चट्टानी भूभाग काफी अधिक होने की बात स्थानीय रिपोर्ट में कही गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, आवासीय और व्यावसायिक निर्माण के दौरान कई जगह ब्लास्टिंग कर चट्टानों को हटाया गया।
स्थानीय आकलन में दावा किया गया है कि कुछ क्षेत्रों में पहले लगभग 70 प्रतिशत तक चट्टानी भूभाग था, जो अब घटकर करीब 30 प्रतिशत रह गया है। हालांकि, इन आंकड़ों के समर्थन में किसी व्यापक आधिकारिक सर्वे का विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन्हें स्थानीय रिपोर्ट में सामने आए आकलन के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
हाथीखेड़ा, बोराज, ब्यावर और किशनगढ़ के आसपास भी छोटी पहाड़ियों और चट्टानी संरचनाओं पर निर्माण तथा खनन के दबाव को लेकर चिंता जताई गई है। पर्यावरण संरक्षण से जुड़े जानकारों के मुताबिक, ऐसी संरचनाओं को हटाने से जमीन की प्राकृतिक बनावट बदल सकती है और वर्षा के पानी के बहाव पर भी असर पड़ सकता है।

Aravalli Hills: अरावली के नुकसान पर क्या कहती हैं रिपोर्ट?
अरावली को हुए नुकसान के आंकड़ों को लेकर अलग-अलग आकलन सामने आए हैं। पर्यावरणविदों के हवाले से पिछले दो दशकों में पर्वतमाला के करीब 35 प्रतिशत हिस्से को नुकसान पहुंचने का अनुमान प्रकाशित हुआ है। वहीं, NDTV की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया कि 2018 तक राजस्थान में अरावली का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा प्रभावित या नष्ट हो चुका था।
CEC की मार्च 2024 की रिपोर्ट में राजस्थान और हरियाणा की अरावली पहाड़ियों से जुड़े खनन मामलों की समीक्षा की गई थी। इसमें अवैध खनन, पर्यावरणीय मंजूरी के बिना खनन गतिविधियों, स्वीकृत शर्तों से अधिक खुदाई और अवैध खनन के मामलों में कार्रवाई की कमियों जैसे मुद्दों को रेखांकित किया गया।
इन तथ्यों से स्पष्ट है कि अरावली के संरक्षण के लिए केवल अवैध खनन पर कार्रवाई करना ही नहीं, बल्कि निर्माण गतिविधियों की निगरानी, नियमों का पालन और प्रभावित क्षेत्रों की बहाली भी जरूरी है।
Aravalli Hills: प्राकृतिक झरनों और वनस्पति पर असर की चिंता
स्थानीय रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चट्टानी इलाकों के करीब 40 प्रतिशत प्राकृतिक झरने बंद हो चुके हैं। हालांकि, इस आंकड़े की पुष्टि करने वाला स्वतंत्र आधिकारिक सर्वे उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद प्राकृतिक जलस्रोतों में कमी की आशंका को गंभीरता से लेने की जरूरत है, क्योंकि पहाड़ियों और आसपास की जमीन का भूजल पुनर्भरण से सीधा संबंध होता है।
रिपोर्ट में गूंदा, खेजड़ी, देसी बबूल, बेर और थोर जैसी स्थानीय वनस्पतियों के घटने की चिंता भी जताई गई है। चट्टानी भूभाग और उसके आसपास की वनस्पति मिट्टी को स्थिर रखने, नमी बनाए रखने और छोटे जीवों को प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराने में मदद करती है।
यदि इन क्षेत्रों में लगातार खुदाई और निर्माण होता है, तो मिट्टी का कटाव बढ़ सकता है। जमीन की ऊपरी उपजाऊ परत हटने से कृषि और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।
Aravalli Hills: रेतीले टीलों का फैलाव भी चिंता का विषय
स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, अजमेर के माकड़वाली, होकरा और कायड़ सहित कुछ क्षेत्रों में रेतीले टीलों का विस्तार दिखाई दे रहा है। पुष्कर-नागौर सीमा, चाचियावास, नसीराबाद और ब्यावर-उदयपुर मार्ग के आसपास भी टीलों के बढ़ने की बात कही गई है।
हालांकि, इन क्षेत्रों में टीलों के फैलाव और अरावली की चट्टानों के नुकसान के बीच प्रत्यक्ष संबंध स्थापित करने के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होगा। भूमि उपयोग में बदलाव, वनस्पति का कम होना, मिट्टी का कटाव और स्थानीय जलवायु जैसे कई कारक किसी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं।
इसलिए समस्या की गंभीरता समझने के लिए केवल स्थानीय अवलोकनों पर निर्भर रहने के बजाय वैज्ञानिक सर्वेक्षण और समय के साथ हुए बदलावों का तुलनात्मक अध्ययन करना महत्वपूर्ण है।
Aravalli Hills: अरावली क्यों है पर्यावरण के लिए जरूरी?
अरावली पर्वतमाला दिल्ली से हरियाणा और राजस्थान होते हुए गुजरात तक फैली है। भारत सरकार के पत्र सूचना कार्यालय (PIB) के अनुसार, यह पर्वतमाला मरुस्थलीकरण के प्रभाव को नियंत्रित करने, भूजल पुनर्भरण और जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाती है।
अरावली की छोटी पहाड़ियां और उनके आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं:
- मिट्टी का संरक्षण: चट्टानें और वनस्पति मिट्टी के कटाव को कम करने में मदद करते हैं।
- भूजल पुनर्भरण: प्राकृतिक ढलान और भू-आकृतियां वर्षा के पानी के जमीन में पहुंचने की प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं।
- जैव विविधता: स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को प्राकृतिक आवास मिलता है।
- मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण: पर्वतमाला और उससे जुड़ा पारिस्थितिकी तंत्र शुष्क क्षेत्रों के विस्तार के प्रभाव को नियंत्रित करने में भूमिका निभाते हैं।
- स्थानीय पर्यावरण: प्राकृतिक भूभाग में बदलाव से जल बहाव, तापमान और आसपास की भूमि की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
Aravalli Hills: अवैध खनन और निर्माण पर निगरानी जरूरी
Aravalli Hills Rajasthan के संरक्षण के लिए अवैध खनन पर प्रभावी कार्रवाई के साथ निर्माण गतिविधियों की नियमित निगरानी जरूरी है। जिन क्षेत्रों में चट्टानों की कटाई हुई है, वहां पर्यावरणीय नुकसान का आकलन कर उपयुक्त बहाली योजना बनाई जा सकती है।
इसके लिए संबंधित विभागों को पहाड़ियों की मैपिंग, खनन पट्टों की जांच, पर्यावरणीय मंजूरियों के पालन और प्राकृतिक जलस्रोतों की स्थिति पर निगरानी बढ़ाने की जरूरत है। स्थानीय निकायों की विकास योजनाओं में भी छोटी पहाड़ियों, जल बहाव के प्राकृतिक रास्तों और संवेदनशील भूभाग को ध्यान में रखना चाहिए।
अरावली का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, बल्कि जल सुरक्षा, भूमि संरक्षण और आने वाली पीढ़ियों के प्राकृतिक संसाधनों से भी जुड़ा है। यदि विकास गतिविधियों के दौरान इन प्राकृतिक संरचनाओं को पर्याप्त सुरक्षा नहीं मिली, तो इसका असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है।
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