राजस्थान की सियासत के ‘जादूगर’ अशोक गहलोत एक बार फिर सुर्खियों में हैं। लेकिन इस बार उनका जादू जनता पर नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के गलियारों में चल रहा है। गहलोत साहब ने अपना सबसे पुराना, सबसे घिसा-पिटा और सबसे ‘सुरक्षित’ हथियार निकाला है — इंदिरा गांधी का नाम!
सवाल ये है कि क्या वाकई देश को इंदिरा जी की जरूरत है, या गहलोत जी को अपनी गिरती हुई साख बचाने के लिए एक ‘मजबूत कंधा’ चाहिए ? आज के दौर में जब अपनी मेहनत, अपना विजन और अपनी जमीन सब कुछ खिसक रहा हो, तब इतिहास की परछाइयों में छिपना कायरता है या फिर एक डूबते हुए नेता की आखिरी हताशा ?
क्या इंदिरा जी का नाम जपने से राहुल गांधी का ‘राजतिलक’ हो जाएगा, या ये सिर्फ उन नेताओं का ‘रोता हुआ चेहरा’ है, जो अपनी ही पार्टी में हाशिए पर धकेल दिए गए हैं ? आज के ‘डेली डोज’ में हम दिखाने की कोशिश करेंगे — राजनीति का वो ‘डरा हुआ सच’, जिसे नेता अक्सर इंदिरा के नाम के पीछे छिपा जाते हैं।
गहलोत साहब कह रहे हैं, कि राहुल गांधी को अब बिना देरी के आधिकारिक नेतृत्व सौंप देना चाहिए। गहलोत जी, इतनी फिक्र राहुल जी की है या अपनी बची-खुची कुर्सी की ? 2023 की हार के बाद पायलट गुट का बढ़ता ‘क्रेज’ और हाईकमान की बेरुखी ने गहलोत को ‘अकेला’ कर दिया है। जिसे खुद अपनी जमीन खिसकती दिख रही हो, वो दूसरों को ‘लीडर’ बनाने की वकालत कर रहा है। ये ‘लीडर’ बनाने का जुनून नहीं, पार्टी में अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने का आखिरी दांव है!
गहलोत जी संजय राउत की बात का समर्थन कर रहे हैं कि जो पार्टियां कांग्रेस छोड़कर गईं, उन्हें ‘घर’ वापस आ जाना चाहिए।
वाह! गहलोत जी, ये ‘घर वापसी’ है या ‘किरायेदारों’ को ढूंढकर अपना मकान भरने की कोशिश ? जिन लोगों ने कांग्रेस का घर सिर्फ इसलिए छोड़ा था, क्योंकि वहां छत टपक रही थी, अब आप उन्हें फिर से उसी पुरानी छत के नीचे बुला रहे हैं ? पहले खुद का ‘कमरा’ तो ठीक कर लीजिए, वरना मेहमान घर आएंगे तो बैठेंगे कहाँ ? जमीन तो वैसे ही, आपके नीचे से खिसक चुकी है।
गहलोत जी कहते हैं, कि 50 साल के करियर में ऐसा खतरनाक माहौल नहीं देखा।
गहलोत साहब, 50 साल में से करीब 40 साल तो सत्ता आपकी या आपके सहयोगियों की रही है। क्या तब देश ‘स्वर्ग’ था ? जनता कह रही है — ये ‘डर का बिजनेस’ बंद कीजिए। जब अपनी योजनाओं का दम खत्म हो जाता है और जनता के बीच ‘कनेक्ट’ टूट जाता है, तो हर नेता को अचानक देश ‘खतरे में’ दिखने लगता है। जनता के कंधों पर बंदूक रखकर निशाना साधना आसान है, क्योंकि अपनी खुद की बंदूक में तो अब बारूद ही नहीं बचा!
बोफोर्स पर शोर मचाने वालों को राफेल पर मौन बताने वाले गहलोत जी से पूछिए — जब आप सत्ता में होते हैं तो फाइलें ‘खो’ जाती हैं, और जब विपक्ष में होते हैं तो फाइलों में ‘भ्रष्टाचार’ नजर आने लगता है। ये दोनों तरफ की पार्टियों का फिक्स मैच है, जहां जनता सिर्फ ‘दर्शक’ है और महंगाई ‘रेफरी’।
इंदिरा गांधी का जिक्र : क्या नेताओं में ‘ओरिजिनल’ विजन की कमी है ?
आजकल हर नेता, इंदिरा गांधी का नाम जपता है। वाजपेयी जी और इंदिरा जी के बीच विरोध था, लेकिन उस विरोध में भी एक ‘कद’ था — एक वैचारिक स्पष्टता थी।
आज के नेताओं को बार-बार इंदिरा गांधी का जिक्र करने की नौबत इसलिए आती है, क्योंकि आज के ‘ब्रांड’ के पास अपना, ‘ओरिजिनल विजन’ नाम की कोई चीज नहीं बची है। इंदिरा गांधी का नाम लेना तो बस एक ‘प्लास्टर’ लगाने जैसा है, ताकि जनता को ये न लगे कि हम खुद अपनी राजनीति में ‘अनाथ’ हो चुके हैं।
क्या ये वाकई देश की चिंता है, या इतिहास के पन्नों में अपनी तस्वीर ढूंढने की हताशा ?
आज का नेता अपने काम के आधार पर जनता से नहीं जुड़ पा रहा, इसीलिए वो इतिहास की ‘ममी’ (Mummy) को निकालकर, उसे राजनीति के मंच पर खड़ा करने की कोशिश कर रहा है। इंदिरा जी के दौर का नाम लेना तो बस ये साबित करता है कि आप के पास, दिखाने के लिए अपना कोई ‘गोल्डन पीरियड’ नहीं है।
सवाल ये नहीं कि इंदिरा गांधी का शासन कैसा था, सवाल ये है कि आज के नेता, जो खुद को 21वीं सदी का भविष्य बताते हैं, वो अपनी लकीर बड़ी करने के बजाय दूसरों की परछाईं के पीछे क्यों छिप रहे हैं ? क्या देश को एक ‘नई विजन’ की तलाश है, या हम इसी तरह पुरानी यादों के सहारे अपनी राजनीति की दुकान चलाते रहेंगे?
खैर, ये राजनीति है और यहाँ तो ‘इंदिरा का भूत’ भी कभी-कभी चुनावी हार के डर से बाहर निकल आता है। बाकी जनता सब जानती है। और हिसाब-किताब भी बराबर रखती है और बराबर रख भी रही होगी। और राजस्थान में तो जनता हर पांच बार में हिसाब बराबर कर भी देती है। शायद यही वजह है कि यहां राज तो बदल जाता है, लेकिन रिवाज नहीं बदल पाता।
ऐसे में सोचना आपको है — गहलोत का ये ‘इंदिरा मंत्र’ कांग्रेस को वापस सत्ता के सिंहासन पर बिठाएगा, या ये सिर्फ डूबते हुए जहाज की आखिरी ‘चेतावनी’ है ?
नमस्कार।
जय हिंद।
जय राजस्थान।