दुनिया के सामने आने वाले महीनों में बड़े Food Crisis का खतरा बढ़ सकता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की चेतावनी के कुछ दिन बाद अब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी वैश्विक खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। पश्चिम एशिया में तनाव, महंगे फर्टिलाइजर, समुद्री रास्तों में बाधा, बढ़ते बीमा खर्च और मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं मिलकर खेती और खाद्य आपूर्ति पर दबाव बढ़ा रही हैं।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत में फिलहाल खाने की कमी हो गई है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास गेहूं और चावल का मजबूत सरकारी भंडार रहा है और हाल के खरीफ सीजन में यूरिया तथा DAP की उपलब्धता भी जरूरत से ज्यादा दर्ज की गई थी। चिंता मुख्य रूप से भविष्य के जोखिम और लागत बढ़ने को लेकर है।
Food Crisis को लेकर निर्मला सीतारमण ने क्या कहा?
नई दिल्ली में Munich Leaders Meeting के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि फर्टिलाइजर की ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतें और Strait of Hormuz में शिपिंग से जुड़ी समस्याएं वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बन रही हैं।
उन्होंने कहा कि अगर किसानों के लिए जरूरी खाद समय पर और उचित कीमत पर उपलब्ध नहीं होगी तो इसका असर आने वाली फसलों और आखिरकार खाद्यान्न की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
सीतारमण के मुताबिक Hormuz संकट के बाद जहाजों की उपलब्धता, containers और war-risk insurance premium की लागत में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। सरकार ने fertiliser लाने वाले जहाजों को अतिरिक्त बीमा लागत से निपटने में मदद देने के लिए एक अलग shipping emergency fund भी बनाया है।
जयशंकर ने भी दी थी बड़े Food Crisis की चेतावनी
इससे कुछ दिन पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने न्यूयॉर्क में Asia Society के कार्यक्रम में आने वाले महीनों में बड़े Food Crisis की आशंका जताई थी।
उन्होंने Ukraine युद्ध और West Asia conflict का हवाला देते हुए कहा था कि इन संकटों ने energy, food, fertiliser और finance—चारों मोर्चों पर दबाव बढ़ाया है।
जयशंकर ने खास तौर पर fertiliser shortage, अनाज की shipping में बाधा और Super El Niño जैसे मौसम संबंधी जोखिमों का उल्लेख किया। उनका कहना था कि इन परिस्थितियों का सबसे ज्यादा दबाव Global South की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
Hormuz का Food Crisis से क्या संबंध?
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। यह सिर्फ तेल और गैस के लिए ही अहम नहीं है, बल्कि बड़ी मात्रा में fertiliser और उसके raw materials भी इसी क्षेत्र से गुजरते हैं।
International Chamber of Commerce के मुताबिक दुनिया के समुद्री रास्ते से जाने वाले fertiliser trade का करीब एक-तिहाई हिस्सा Hormuz से जुड़ा रहता है। इस मार्ग पर लंबे समय तक बाधा रहने से खाद की उपलब्धता कम और कीमतें ज्यादा हो सकती हैं।
यही कारण है कि Hormuz का संकट केवल fuel crisis नहीं रह जाता। महंगा fertiliser किसानों की लागत बढ़ाता है और अगर उसकी उपलब्धता घटे तो फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे Food Crisis का खतरा बढ़ जाता है।
Bab el-Mandeb और Malacca पर भी नजर
वित्त मंत्री ने केवल Hormuz ही नहीं, दूसरे महत्वपूर्ण sea routes का भी जिक्र किया है।
West Asia में Bab el-Mandeb पहले से दबाव में है। सितंबर में इसके जरिए होने वाला ship traffic भी सामान्य स्तर से नीचे था।
सीतारमण ने Strait of Malacca को लेकर कहा कि वहां फिलहाल समस्या नहीं है, लेकिन यदि इस route पर भी कोई बड़ी बाधा पैदा होती है तो स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है।
इन समुद्री रास्तों के जरिए energy, raw materials, fertilisers और दूसरी जरूरी वस्तुओं का वैश्विक व्यापार होता है।
भारत में फिलहाल Food Crisis है क्या?
नहीं। फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक आंकड़े भारत में राष्ट्रीय स्तर के Food Crisis की स्थिति नहीं दिखाते।
भारत सरकार ने मई 2026 में बताया था कि Central Pool में गेहूं और चावल का stock तय buffer norms से काफी ज्यादा था।
28 मई तक Central Pool में करीब 513 लाख मीट्रिक टन गेहूं मौजूद था, जबकि 1 जुलाई के लिए तय buffer norm 275.80 LMT था।
इसी तरह चावल का stock करीब 397 LMT था, जबकि निर्धारित norm 135.40 LMT था। इसके अलावा बड़ी मात्रा में खरीदा गया धान milling के बाद stock में जुड़ना बाकी था।
इसलिए अभी भारत के लिए मुख्य चिंता तत्काल अनाज खत्म होने की नहीं, बल्कि भविष्य में लागत, मौसम और supply-chain disruption के असर की है।
भारत में खाद की क्या स्थिति है?
Fertiliser के मामले में भारत वैश्विक बाजार से पूरी तरह अलग नहीं रह सकता। देश को कई fertilisers और उनके raw materials के लिए आयात की जरूरत पड़ती है।
West Asia crisis के कारण ammonia, phosphoric acid, sulphur और potash जैसी चीजों की imports पर freight, insurance और shipping delays का असर पड़ा है। केंद्र सरकार ने इन जोखिमों से निपटने के लिए sourcing diversification और long-term supply arrangements जैसे कदम उठाए हैं।
हालांकि जुलाई के अंत तक सरकार के आंकड़ों में खरीफ 2026 के लिए fertiliser availability आरामदायक थी।
29 जुलाई तक Urea की pro-rata requirement 122.84 LMT के मुकाबले availability 177.28 LMT और DAP की requirement 35.44 LMT के मुकाबले availability 43.03 LMT थी।
यानी उस समय देश में व्यापक खाद की कमी नहीं थी।
फिर चिंता क्यों है?
Food Crisis को लेकर असली चिंता आगे के महीनों की है।
भारत में अभी stock होने के बावजूद अगर वैश्विक fertiliser prices लंबे समय तक ऊंचे रहते हैं तो सरकार की subsidy cost बढ़ सकती है। Import करने वाले जहाजों का insurance महंगा होने से fertiliser की landed cost भी बढ़ती है।
इसके अलावा अगर shipping routes बार-बार बाधित होते हैं तो सामान समय पर पहुंचने में समस्या हो सकती है।
वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार domestic urea और phosphate production बढ़ाने की कोशिश कर रही है, लेकिन नई उत्पादन क्षमता विकसित करने में समय लगेगा।
सरकार किसानों को महंगे खाद से कैसे बचा रही?
भारत में किसानों को fertilisers international market price पर नहीं बेचे जाते। सरकार बड़ी subsidy देकर कीमतों को नियंत्रित रखती है।
जुलाई में केंद्र ने बताया था कि DAP का 50 किलो का bag किसानों को ₹1,350 में उपलब्ध रखने के लिए special financial support जारी रखा गया है।
यानी global fertiliser prices बढ़ने का पूरा बोझ फिलहाल सीधे किसान पर डालने की नीति नहीं है।
लेकिन लंबे समय तक ऊंची कीमत रहने पर सरकार पर subsidy का वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
El Niño भी बढ़ा सकता है जोखिम
वैश्विक Food Crisis में geopolitics अकेला खतरा नहीं है।
मौसम भी बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत सरकार की September Economic Review में strong El Niño की स्थिति से winter crops पर असर पड़ने की आशंका का उल्लेख किया गया है। साथ ही ऊंचे crude oil prices और geopolitical tensions से imported inflation बढ़ने का जोखिम बताया गया है।
अगर खराब मौसम के कारण उत्पादन घटता है और उसी समय fertiliser व transportation cost बढ़ती है तो food inflation पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
आम आदमी पर क्या असर हो सकता है?
भारत में Food Crisis का पहला प्रभाव जरूरी नहीं कि बाजार में अनाज गायब होने के रूप में दिखाई दे।
शुरुआती असर कीमतों में दिखाई दे सकता है।
फर्टिलाइजर महंगा होने से खेती की लागत बढ़ सकती है। महंगा diesel और shipping transport cost बढ़ा सकते हैं। खराब मौसम सब्जी, दाल, अनाज या oilseed production को प्रभावित कर सकता है।
अगर ये सभी परिस्थितियां एक साथ बनीं तो खाद्य महंगाई बढ़ सकती है।
हाल की आर्थिक रिपोर्टों में भी food inflation पर global supply pressure और El Niño के संभावित असर को लेकर चिंता जताई गई है।
भारत ने क्या तैयारी की है?
सरकार की रणनीति कई स्तरों पर चल रही है।
सबसे पहले fertiliser imports के sources को diversify किया जा रहा है। Saudi Arabia समेत कई देशों के साथ long-term supply arrangements किए गए हैं।
दूसरा, domestic fertiliser production बढ़ाने की कोशिश हो रही है।
तीसरा, shipping disruption के कारण आने वाली अतिरिक्त insurance cost से निपटने के लिए emergency support दिया जा रहा है।
इसके अलावा सरकार wheat और rice के buffer stocks बनाए रखती है, जिनका इस्तेमाल जरूरत पड़ने पर welfare schemes और market intervention के लिए किया जा सकता है।
क्या लोगों को घबराने की जरूरत है?
फिलहाल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भारत में तत्काल Food Crisis या राशन-अनाज की देशव्यापी कमी जैसी स्थिति नहीं है।
भारत के सरकारी foodgrain stocks मजबूत रहे हैं और हालिया उपलब्ध आधिकारिक data में fertiliser availability भी requirement से ऊपर रही है।
लेकिन निर्मला सीतारमण और एस. जयशंकर की चेतावनी को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
दुनिया में fertiliser shortage, Hormuz और Bab el-Mandeb जैसे महत्वपूर्ण shipping routes में बाधा, महंगा crude oil, Ukraine-West Asia conflicts और El Niño एक साथ agriculture पर दबाव डाल रहे हैं।
इसलिए भारत के लिए फिलहाल कहानी “खाना खत्म होने वाला है” जैसी नहीं, बल्कि “आने वाले महीनों में supply और कीमतों को संभालने की चुनौती बढ़ सकती है” वाली है।
यही वजह है कि वैश्विक Food Crisis की आशंका के बीच भारत fertiliser stocks, घरेलू उत्पादन, shipping support और foodgrain buffer पर जोर दे रहा है। आने वाले महीनों में रबी फसल, मौसम और global fertiliser supply यह तय करेंगे कि इस संकट का भारतीय बाजार और आम लोगों की जेब पर कितना असर पड़ता है।

