भाई-बहन का रिश्ता हिंदी सिनेमा में कभी सिर्फ कहानी का एक हिस्सा नहीं रहा। एक दौर था जब राखी का एक धागा पूरी फिल्म की कहानी का रुख बदल देता था। बहन की आंखों में आंसू आते थे तो सिनेमाघरों में बैठे दर्शकों की आंखें भी नम हो जाती थीं और भाई अपनी बहन की रक्षा के लिए खलनायकों की पूरी फौज से अकेला भिड़ जाता था।
रक्षाबंधन के मौके पर आइए जानते हैं कि हिंदी सिनेमा में भाई-बहन का रिश्ता कैसे बदला और ‘छोटी बहन’ से लेकर ‘जिगरा’ तक इस रिश्ते ने कितने अलग-अलग रंग देखे।
छोटी बहन से शुरू हुआ भावुक फिल्मी सफर
हिंदी सिनेमा के शुरुआती दशकों से ही परिवार उसकी कहानियों के केंद्र में रहा। माता-पिता का त्याग, भाइयों के बीच टकराव और बहन के लिए भाई की जिम्मेदारी जैसे विषय दर्शकों को बेहद करीब लगते थे।
1959 में आई फिल्म ‘छोटी बहन’ ने भाई-बहन के रिश्ते को बेहद भावुक अंदाज में पर्दे पर पेश किया। बलराज साहनी, नंदा और रहमान अभिनीत इस फिल्म का गीत “भैया मेरे, राखी के बंधन को निभाना” रक्षाबंधन की भावनाओं से इस कदर जुड़ा कि यह गीत आज भी इस पर्व की पहचान माना जाता है।
इसके बाद ‘राखी’ जैसी फिल्मों ने भाई की जिम्मेदारी, बहन के प्रति प्यार और परिवार के लिए त्याग को कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

70 और 80 के दशक में भाई बना बहन का रक्षक
सत्तर के दशक में भाई-बहन का रिश्ता हिंदी फिल्मों में और मजबूत हुआ। 1971 की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में देव आनंद और जीनत अमान ने बिछड़े भाई-बहन की कहानी को पर्दे पर उतारा। फिल्म का गीत “फूलों का तारों का” आज भी भाई-बहन के प्यार के सबसे लोकप्रिय फिल्मी गीतों में शामिल है।
इसके बाद ‘रेशम की डोरी’ जैसे फिल्मों और गीतों ने राखी और भाई-बहन के भावनात्मक संबंध को और लोकप्रिय बनाया।
सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों में अक्सर बहन पर संकट आता था और भाई उसके लिए पूरी दुनिया से लड़ने निकल पड़ता था। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, राजेश खन्ना और शशि कपूर जैसे बड़े सितारों ने भी ऐसे किरदार निभाए, जिनमें बहन की सुरक्षा और परिवार की जिम्मेदारी उनके चरित्र की अहम पहचान थी।
हालांकि उस दौर में भाई-बहन का रिश्ता अक्सर एक पारंपरिक ढांचे में दिखाया जाता था—भाई ताकतवर रक्षक होता था, जबकि बहन संवेदनशील और सहायता की प्रतीक्षा करने वाली भूमिका में नजर आती थी।
जोश में शाहरुख खान बने ऐश्वर्या राय के भाई
नई पीढ़ी के लिए इस रिश्ते की सबसे चर्चित कास्टिंग में से एक साल 2000 की फिल्म ‘जोश’ रही। शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय जैसे लोकप्रिय सितारों को निर्देशक मंसूर खान ने रोमांटिक जोड़ी के बजाय जुड़वां भाई-बहन के रूप में पेश किया।
शाहरुख ने मैक्स और ऐश्वर्या ने शर्ली का किरदार निभाया। दोनों पर्दे पर लड़ते-झगड़ते, मस्ती करते और मुश्किल वक्त में एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई दिए।
यह कास्टिंग इसलिए भी खास थी क्योंकि दोनों सितारे उस समय अपनी रोमांटिक छवि के लिए बेहद लोकप्रिय थे। आज भी सवाल उठता है कि क्या आज का कोई बड़ा निर्माता दो बेहद लोकप्रिय सितारों को इसी तरह भाई-बहन के किरदार में कास्ट करने का जोखिम उठाएगा?
आधुनिक सिनेमा में बदला भाई-बहन का रिश्ता
नई सदी में हिंदी फिल्मों ने भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ राखी, रक्षा और त्याग तक सीमित नहीं रखा। ‘फिजा’ में बहन अपने लापता भाई की तलाश करती है, जबकि ‘माई ब्रदर निखिल’ में बहन अपने भाई के लिए सामाजिक अस्वीकार्यता के खिलाफ मजबूती से खड़ी दिखाई देती है।
भाई-बहन का रिश्ता, ‘सरबजीत’ में ऐश्वर्या राय ने अपने भाई को न्याय दिलाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करने वाली बहन का किरदार निभाया। वहीं ‘दिल धड़कने दो’ में रणवीर सिंह और प्रियंका चोपड़ा का रिश्ता आधुनिक भाई-बहन की साझेदारी दिखाता है, जहां भाई अपनी बहन की स्वतंत्रता और फैसलों के पक्ष में खड़ा होता है।
2022 की ‘रक्षा बंधन’ ने भाई और उसकी चार बहनों के रिश्ते को कहानी का केंद्र बनाया और विवाह तथा दहेज जैसी सामाजिक समस्याओं को भी इससे जोड़ा।
जिगरा ने बदल दी रक्षा की पूरी कहानी
हाल के वर्षों में ‘जिगरा’ ने इस रिश्ते को एक नया मोड़ दिया। यहां आलिया भट्ट का किरदार अपने छोटे भाई को बचाने के लिए हर सीमा पार करने को तैयार दिखाई देता है।
यानी अब कहानी सिर्फ यह नहीं है कि भाई अपनी बहन की रक्षा करेगा। आधुनिक सिनेमा यह भी दिखा रहा है कि जरूरत पड़ने पर बहन भी भाई की ढाल बन सकती है।
इसी बदलाव ने भाई-बहन का रिश्ता को पारंपरिक भावुकता से निकालकर बराबरी, जिम्मेदारी, संघर्ष और व्यक्तिगत फैसलों से जोड़ दिया है।
भाई-बहन का रिश्ता: राखी का धागा आज भी उतना ही मजबूत है
‘छोटी बहन’ से लेकर ‘हरे रामा हरे कृष्णा’, ‘जोश’, ‘सरबजीत’, ‘दिल धड़कने दो’, ‘रक्षा बंधन’ और ‘जिगरा’ तक का सफर बताता है कि हिंदी सिनेमा में भाई-बहन के रिश्ते का रूप जरूर बदला है, लेकिन इसकी भावनात्मक ताकत आज भी कायम है।
शायद बड़े पर्दे पर इस रिश्ते पर पहले जितनी फिल्में नहीं बनतीं, लेकिन जब इसे ईमानदारी से कहानी का हिस्सा बनाया जाता है तो दर्शक उससे जुड़ जाते हैं।
आखिर राखी सिर्फ कलाई पर बंधा एक धागा नहीं है। यह उस भरोसे का नाम है कि जिंदगी की कहानी में कोई ऐसा जरूर है, जो हर मुश्किल मोड़ पर हमारे साथ खड़ा रहेगा।




