ISRO Privatization: भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी कंपनियों की बढ़ती भूमिका को लेकर कांग्रेस ने केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोमवार को आरोप लगाया कि सरकार अंतरिक्ष क्षेत्र में तेजी से निजी भागीदारी बढ़ाते हुए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO की पारंपरिक भूमिका को सीमित कर रही है। उन्होंने रॉकेट निर्माण, सैटेलाइट से जुड़ी परिसंपत्तियों, तमिलनाडु में बन रहे दूसरे स्पेसपोर्ट और ISRO से पेशेवरों के कथित तौर पर नौकरी छोड़ने जैसे मुद्दे उठाए।
हालांकि यह समझना भी जरूरी है कि सरकार की Indian Space Policy 2023 में पहले से कहा गया है कि ISRO धीरे-धीरे mature और operational space systems के नियमित manufacturing से बाहर निकलेगा और ऐसी technologies को commercial exploitation के लिए industry को transfer करेगा। नीति में ISRO का मुख्य फोकस advanced technology, R&D, नई प्रणालियों और राष्ट्रीय महत्व के missions पर रखने की बात है। इसलिए कांग्रेस जिस बदलाव को “privatisation” बता रही है, सरकार उसे space-sector reforms और private participation बढ़ाने की नीति के रूप में पेश करती रही है।

ISRO Privatization पर जयराम रमेश ने क्या कहा?
ISRO Privatization की बहस जयराम रमेश के ताजा बयान के बाद एक बार फिर तेज हो गई है। रमेश ने कहा कि हाल के दिनों में ISRO की भविष्य की भूमिका को लेकर आई रिपोर्टें गंभीर सवाल पैदा करती हैं, क्योंकि इस संस्था ने करीब छह दशकों में अपनी तकनीकी क्षमता और expertise तैयार की है।
कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार का अंतरिक्ष कार्यक्रम को लेकर “aggressive privatisation agenda” है।
उनका दावा है कि आने वाले समय में:
- रॉकेट development और manufacturing में ISRO की भूमिका कम हो सकती है।
- Satellite-related assets का बड़ा हिस्सा private companies को दिया जा सकता है।
- Commercial और mature technologies का संचालन उद्योग के हाथों में तेजी से जा सकता है।
- नए space infrastructure के operation में भी private sector की भूमिका बढ़ेगी।
इनमें से कई बातें कांग्रेस के राजनीतिक आरोप हैं। सरकार या ISRO की ओर से जयराम रमेश के इस ताजा बयान पर तत्काल अलग से कोई विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है।
‘Private sector को बढ़ावा दें, लेकिन ISRO को कमजोर क्यों?’
जयराम रमेश ने साफ किया कि कांग्रेस private space startups को बढ़ावा देने के खिलाफ नहीं है।
उन्होंने सवाल किया कि जब ISRO पहले से उद्योग और निजी कंपनियों के साथ मिलकर काम करता रहा है, तो private sector को आगे बढ़ाने के लिए संस्था की भूमिका घटाने की जरूरत क्यों होनी चाहिए।
यहीं ISRO Privatization पर सरकार और कांग्रेस के नजरिए में बड़ा अंतर दिखाई देता है।
कांग्रेस का तर्क है कि निजी कंपनियों का विस्तार ISRO की institutional capacity को कमजोर किए बिना होना चाहिए।
दूसरी तरफ, केंद्र सरकार की घोषित नीति का उद्देश्य routine और mature commercial activities उद्योग को सौंपकर ISRO को advanced R&D, exploration और नई technologies पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर देना है। ISRO के आधिकारिक reform framework में भी NSIL को operational launch vehicles, commercial launches और services की बड़ी जिम्मेदारी देने की बात कही गई है।
ISRO Privatization: रॉकेट निर्माण में क्या सच में घटेगी ISRO की भूमिका?
यह दावा पूरी तरह हवा में नहीं है कि operational systems में उद्योग की भूमिका बढ़ाई जा रही है, क्योंकि Indian Space Policy 2023 में इसका स्पष्ट framework मौजूद है।
Policy के अनुसार ISRO को existing practice यानी operational space systems के manufacturing से धीरे-धीरे बाहर निकलना है। जिन technologies और systems को mature माना जा चुका है, उन्हें commercial exploitation के लिए industry को transfer किया जा सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ISRO रॉकेट या satellites पर काम करना बंद कर देगा।
ISRO की आधिकारिक mission objectives में अब भी:
- launch vehicles और संबंधित technologies का development,
- satellites का design और development,
- planetary exploration,
- space science research,
- नई technologies का development
शामिल हैं।
यानी बदलाव मुख्य रूप से mature operational systems की production और commercialisation में private industry की बड़ी भूमिका देने से जुड़ा है।
तमिलनाडु के दूसरे Spaceport पर क्यों उठा सवाल?
ISRO Privatization विवाद में सबसे ठोस और ताजा उदाहरण तमिलनाडु के Kulasekarapattinam Small-Satellite Launch Complex का है।
IN-SPACe ने भारतीय private entities से Expression of Interest आमंत्रित किया है ताकि किसी private player को इस launch complex के operation और management की जिम्मेदारी दी जा सके। यह facility तमिलनाडु के Thoothukudi जिले में विकसित की जा रही है।
Project की लागत अलग-अलग रिपोर्टों में करीब ₹950 करोड़ से ₹986 करोड़ बताई गई है। IN-SPACe की प्रक्रिया में selected private party launch operations, maintenance और services संभालेगी, जबकि शुरुआती अवधि में ISRO technical guidance, training और operational support देगा।
यही वह कदम है जिसका जिक्र करते हुए जयराम रमेश ने सवाल उठाया कि सरकार करीब ₹1,000 करोड़ के सार्वजनिक निवेश से तैयार हो रहे दूसरे spaceport को private company के संचालन में क्यों देना चाहती है।
ध्यान रहे, यहां spaceport के ownership transfer और उसके operation-management को private company को देने में अंतर है। उपलब्ध जानकारी operation और management private entity को देने की प्रक्रिया की पुष्टि करती है।
ISRO Privatization: श्रीहरिकोटा को लेकर भी कांग्रेस ने उठाया सवाल
Kulasekarapattinam को लेकर सामने आई योजना के बाद जयराम रमेश ने आंध्र प्रदेश स्थित Satish Dhawan Space Centre, Sriharikota के भविष्य पर भी सवाल उठाया।
उन्होंने कहा कि जिस तरह नए spaceport में private operator की तैयारी हो रही है, उसके बाद Sriharikota की भविष्य की भूमिका को लेकर भी सवाल स्वाभाविक हैं।
हालांकि अभी ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा सामने नहीं आई है कि Sriharikota का operation किसी private entity को सौंपा जा रहा है।
इसलिए Sriharikota को लेकर कही गई बात को फिलहाल कांग्रेस की आशंका ही माना जाना चाहिए, न कि सरकार का घोषित फैसला।
100-120 ISRO Professionals के छोड़ने का दावा
जयराम रमेश ने एक और गंभीर दावा करते हुए कहा कि हाल के महीनों में करीब 100 से 120 महत्वपूर्ण ISRO professionals संस्था छोड़ चुके हैं।
उन्होंने इसे ISRO की भविष्य की दिशा से जोड़ते हुए सवाल उठाया।
हालांकि यह संख्या Department of Space की ओर से आधिकारिक रूप से प्रकाशित आंकड़ा नहीं है।
जुलाई में आई कुछ मीडिया रिपोर्टों में भी 100-120 professionals के resign करने की बात कही गई थी। इनमें करीब 80 लोगों के U R Rao Satellite Centre और लगभग 20 के Vikram Sarabhai Space Centre से जाने का दावा किया गया था। लेकिन exact figure की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए इसे verified government statistic की जगह media reports और कांग्रेस के दावे के तौर पर ही लिखना सही होगा।
पूर्व ISRO चीफ माधवन नायर का भी जिक्र
जयराम रमेश ने अपने बयान में पूर्व ISRO Chairman G. Madhavan Nair का भी जिक्र किया।
माधवन नायर ने हाल ही में IN-SPACe की भूमिका और ISRO की technologies तथा assets से जुड़े tenders को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा कि institutional independence और ISRO की strategic capabilities को सुरक्षित रखना जरूरी है।
इसी संदर्भ में जयराम रमेश ने सवाल किया कि दूसरे जीवित पूर्व ISRO chairmen भी इस मुद्दे पर अपनी राय सार्वजनिक क्यों नहीं रखते।
ISRO Privatization: सरकार की Space Policy आखिर कहती क्या है?
ISRO Privatization पर हो रही राजनीतिक बहस को समझने के लिए सरकार की official policy महत्वपूर्ण है।
Indian Space Policy 2023 के तहत सरकार ने private companies को space sector की पूरी value chain में ज्यादा अवसर दिए हैं।
इसमें private entities:
- rockets बना सकती हैं,
- satellites तैयार कर सकती हैं,
- launch services दे सकती हैं,
- space-based services चला सकती हैं,
- ISRO infrastructure का उपयोग कर सकती हैं,
- अपना space infrastructure भी विकसित कर सकती हैं।
IN-SPACe private sector को authorize और regulate करता है, जबकि NSIL commercial activities और ISRO-developed technologies की commercialization में भूमिका निभाता है।
सरकार ने निजी space ecosystem के लिए ₹1,000 करोड़ का Venture Capital Fund, ₹500 करोड़ का Technology Adoption Fund और ISRO infrastructure तक आसान access जैसी योजनाएं भी शुरू की हैं।
क्या ISRO को Private किया जा रहा है?
इस सवाल का सीधा जवाब थोड़ा nuanced है।
ISRO को किसी private company को बेचने या संस्था को private बनाने की कोई घोषणा नहीं हुई है।
लेकिन यह सही है कि केंद्र सरकार की घोषित policy के तहत ऐसे operational और commercial काम, जिन्हें ISRO पहले खुद करता था, उनमें private industry और NSIL की भूमिका तेजी से बढ़ाई जा रही है। Mature technologies को industry में transfer करना भी official policy का हिस्सा है।
इसलिए वर्तमान विवाद वास्तव में इस बात पर है कि private participation की सीमा कहां तक होनी चाहिए और ISRO के पास कौन-सी strategic capabilities हमेशा बनी रहनी चाहिए।
कांग्रेस का तर्क है कि reforms के नाम पर institution को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। सरकार का घोषित तर्क है कि routine production private sector को देने से ISRO नई technologies और ambitious missions पर ज्यादा resources लगा सकेगा।
ISRO Privatization विवाद की बड़ी बातें
- जयराम रमेश ने केंद्र पर aggressive space privatisation का आरोप लगाया।
- कांग्रेस private startups को बढ़ावा देने के खिलाफ नहीं है।
- सवाल ISRO की भविष्य की institutional role को लेकर उठाया गया है।
- Indian Space Policy 2023 mature operational systems को industry में transfer करने की बात करती है।
- ISRO का focus advanced R&D, नई technology और national missions पर रखने की नीति है।
- Kulasekarapattinam spaceport के operation-management के लिए private entities से EOI मांगी गई है।
- इसकी लागत करीब ₹986 करोड़ बताई गई है।
- Sriharikota को private sector को देने की कोई घोषित योजना फिलहाल सामने नहीं है।
- जयराम रमेश ने 100-120 ISRO professionals के संस्था छोड़ने का दावा किया।
- इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
- पूर्व ISRO Chairman G Madhavan Nair ने भी IN-SPACe की भूमिका पर चिंता जताई है।
- सरकार private participation को space economy और innovation बढ़ाने की रणनीति बताती रही है।
ISRO Privatization: अब बहस किस बात पर?
कुल मिलाकर ISRO Privatization की मौजूदा बहस केवल private companies को space sector में प्रवेश देने तक सीमित नहीं है। Private participation बढ़ाने का रास्ता सरकार 2020 के reforms और 2023 की Space Policy के बाद पहले ही खोल चुकी है।
अब राजनीतिक सवाल इस बात पर केंद्रित है कि ISRO की operational भूमिका कितनी कम की जाएगी, कौन-सी technologies private industry को दी जाएंगी और strategic infrastructure पर सरकारी संस्था का नियंत्रण किस स्तर तक बना रहेगा।
कांग्रेस ने इसे ISRO की institutional strength से जुड़ा मुद्दा बनाया है, जबकि official policy का उद्देश्य mature commercial activities industry को देकर ISRO को cutting-edge research और advanced missions पर केंद्रित करना बताती है।
फिलहाल जयराम रमेश के ताजा आरोपों पर केंद्र सरकार या Department of Space की विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है।
आधिकारिक जानकारी के लिए ISRO की Space Sector Reforms जानकारी और IN-SPACe की आधिकारिक जानकारी देखी जा सकती है।
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