कोटा, बीकानेर और अब जोधपुर में प्रसूताओं की मौत और बिगड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। हर घटना के बाद जांच समितियां बनती हैं, बयान आते हैं, लेकिन क्या उनकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक होती है और क्या जवाबदेही तय होती है? यह मुद्दा सिर्फ राजनीति का नहीं, बल्कि उन आम लोगों का है जो सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर भरोसा करके अस्पताल पहुंचते हैं। आखिर गरीब की जान की कीमत क्या सिर्फ एक और जांच समिति है?
