लखीमपुर का ‘गोल्डन बंदर’: 17 साल पुराने केस में पुलिस की अनोखी दलील

Atul Ahsas
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Image: AI

‘जनाब, सोना चोरी नहीं हुआ, बंदर ले गया!’ यह कोई व्यंग्य कथा नहीं है, न ही किसी स्टैंड-अप कॉमेडियन का पंचलाइन।

उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में 17 साल पुराने दहेज उत्पीड़न मामले में अदालत ने आदेश दिया कि मालखाने में जमा सोने के जेवर उनके मालिक को लौटाए जाएँ। मामला यहीं तक रहता तो यह एक सामान्य न्यायिक प्रक्रिया होती। लेकिन जब जेवर लौटाने की बारी आई, तब पुलिस का जवाब भारतीय प्रशासनिक इतिहास के सबसे रचनात्मक बहानों में दर्ज होने लायक निकला। पुलिस ने अदालत को बताया कि मालखाने में रखी सोने की पोटली बारिश में भीग गई थी। उसे सुखाने के लिए छत पर रखा गया। तभी एक बंदर आया, पोटली उठाई और फरार हो गया। यानी जिस सोने को 17 साल तक चोर, डकैत, अपराधी और भ्रष्टाचार नहीं ले जा पाए, उसे एक बंदर लेकर उड़ गया!

कहानी सुनकर अदालत भी हैरान रह गई। और जनता सोच रही है कि यह पुलिस का स्पष्टीकरण है या किसी बच्चों की कॉमिक का नया संस्करण। व्यंग्य यह नहीं है कि बंदर सोना ले गया। व्यंग्य यह है कि इस देश में हर गड़बड़ी के लिए कोई न कोई जीव-जंतु हमेशा तैयार रहता है।

कभी फाइलें दीमक खा जाती हैं। कभी रिकॉर्ड चूहे कुतर जाते हैं। कभी सबूत आग में जल जाते हैं। और अब सोना बंदर ले जा रहे हैं। लगता है सरकारी विभागों के सबसे बड़े अपराधी इंसान नहीं, वन्यजीव हैं।

अगर यही रफ्तार रही तो कल को कोई अधिकारी बताएगा, सर, घोटाले की रकम तो वापस कर देते, लेकिन उसे तोते ने विदेशी बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिया।
या फिर, महोदय, सरकारी जमीन पर कब्जा नहीं हुआ था, हाथियों ने गलती से कॉलोनी बसा दी। मगर असली सवाल बहाने का नहीं, भरोसे का है।

मालखाना कोई छत पर रखा अनाज नहीं होता। वह अदालत के भरोसे और कानून की निगरानी में रखा गया साक्ष्य और संपत्ति होती है। यदि सचमुच एक बंदर वहाँ से सोने की पोटली लेकर चला गया, तो यह सुरक्षा व्यवस्था की ऐसी पोल है जो किसी भी ताले से नहीं ढँक सकती। और यदि कहानी में कुछ और है, तो फिर वह और भी गंभीर मामला है।

सबसे बड़ी विडंबना देखिए, जिस महिला ने 17 साल तक न्याय का इंतजार किया, उसे आखिर में यह सुनने को मिला कि उसका सोना अब पुलिस के पास नहीं, बल्कि शायद किसी पेड़ पर रहने वाले “स्वर्ण व्यापारी बंदर” के कब्जे में है। देश में न्याय मिलने में वर्षों लग जाते हैं, लेकिन जवाबदेही गायब होने में कुछ सेकंड ही काफी हैं।

कभी-कभी लगता है कि हमारे तंत्र में दो ही चीजें सबसे सुरक्षित है,पहला, बहाने। दूसरा, बहाना बनाने वाले। बाकी फाइलें, सबूत, रिकॉर्ड, और अब तो सोना भी सुरक्षित नहीं है।

लखीमपुर खीरी की इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हमारे सिस्टम में समस्या सिर्फ चोरी की नहीं है, समस्या उस मानसिकता की है जो हर सवाल का जवाब ढूँढ़ने के बजाय हर जवाब के लिए एक नया बहाना ढूँढ़ लेती है। और शायद यही कारण है कि जनता अब यह नहीं पूछ रही कि सोना कहाँ गया? जनता यह पूछ रही है कि, आखिर इस देश में हर बार जवाबदेही ही क्यों बंदर बनकर पेड़ पर चढ़ जाती है?

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