तस्वीरों में सब कुछ कितना सुंदर दिखता है ना। एक तरफ अशोक गहलोत जी ठहाके लगा रहे हैं, दूसरी तरफ सचिन पायलट जी हाथ मिलाकर मुस्कुरा रहे हैं, चेहरों पर अपनापन है, माहौल में गर्मजोशी है, और कैमरों के लिए ऐसा दृश्य मानो राजस्थान कांग्रेस में अब कोई मतभेद बचा ही नहीं।
लेकिन राजनीति में तस्वीरें अक्सर सच नहीं, संदेश देती हैं। सवाल यह है कि यह मुलाकात दिल से थी या दिल्ली के लिए थी? क्या यह वही अशोक गहलोत नहीं हैं जिन्होंने कुछ दिन पहले ही पायलट पर तंज कसते हुए कहा था कि राजनीति में धैर्य रखना चाहिए, सब कुछ जल्दी नहीं मिलता? क्या यह वही सचिन पायलट नहीं हैं जिन्हें कभी “निकम्मा”, “नकारा” और पार्टी को गिराने की साजिश करने वाला तक कहा गया था? आज दोनों साथ हंस रहे हैं। तो क्या जनता यह मान ले कि पिछले पांच साल का सियासी महाभारत सिर्फ एक गलतफहमी थी?
राजस्थान कांग्रेस का सबसे लंबा पारिवारिक झगड़ा
2020 का वह दौर कौन भूल सकता है, जब सचिन पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली और हरियाणा में डेरा डाले बैठे थे। गहलोत खेमे ने उन्हें भाजपा की “बी-टीम” बताया। पायलट खेमे ने गहलोत पर युवाओं को दबाने का आरोप लगाया। उस समय कांग्रेस के भीतर जो शब्द चले, वे किसी विपक्षी दल के लिए भी शायद इस्तेमाल नहीं होते।

फिर आया 2023 का विधानसभा चुनाव। दिल्ली ने बार-बार समझौते की कोशिश की। राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने दोनों नेताओं को साथ बैठाया। लेकिन जमीन पर दोनों खेमों के बीच तलवारें म्यान में कम और बाहर ज्यादा दिखीं। और अब अचानक इतनी मोहब्बत?
तस्वीरों में देखकर ऐसा लग रहा है जैसे दोनों नेता एक-दूसरे के बिना राजनीति की कल्पना ही नहीं कर सकते। लेकिन राजनीति के पुराने खिलाड़ी जानते हैं कि चुनावी हार के बाद कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता भाजपा नहीं, बल्कि अपनी अंदरूनी कलह है। दिल्ली को यह संदेश देना जरूरी है कि राजस्थान में सब कुछ नियंत्रण में है। इसलिए मंच पर मुस्कान जरूरी है। हाथ मिलाना जरूरी है। ठहाके लगाना जरूरी है। क्योंकि कैमरा नाराज़गी नहीं, एकता दिखाता है।
राहुल गांधी को संदेश या कार्यकर्ताओं को?
राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि यह तस्वीरें सिर्फ फोटो नहीं, एक राजनीतिक संदेश हैं। संदेश राहुल गांधी के लिए, देखिए, राजस्थान में सब ठीक है। संदेश हाईकमान के लिए, यहां कोई गुटबाजी नहीं है। संदेश कार्यकर्ताओं के लिए, लड़ाई खत्म हो गई है। लेकिन कार्यकर्ता भी कम समझदार नहीं हैं। उन्हें याद है कि जब मुख्यमंत्री की कुर्सी का सवाल था, तब यही दो ध्रुव आमने-सामने खड़े थे। उन्हें याद है कि चुनाव से पहले टिकट वितरण पर कितना घमासान हुआ था। उन्हें याद है कि हर बयान के पीछे एक नया सियासी तीर छिपा होता था।
राजनीति में मुस्कान का अर्थ
राजनीति में मुस्कुराहट हमेशा दोस्ती की निशानी नहीं होती। कई बार यह मजबूरी होती है। कई बार रणनीति होती है। कई बार हाईकमान का आदेश होता है। और कई बार यह वह विराम होता है जो अगले अध्याय की शुरुआत से पहले आता है। इन तस्वीरों को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे राजस्थान कांग्रेस की पूरी “रामायण” समाप्त हो गई हो और अब सभी पात्र अयोध्या लौट आए हों। लेकिन राजनीति के जानकार जानते हैं कि यह कहानी रामायण से ज्यादा “महाभारत” वाली है। यहां युद्ध खत्म नहीं होते, बस युद्धविराम घोषित होता है।
आज गहलोत और पायलट की मुस्कानें चर्चा में हैं। कल फिर कोई बयान आएगा, कोई समर्थक नाराज़ होगा, कोई खेमेबाजी की खबर चलेगी, और फिर नई तस्वीरें आएंगी, नए ठहाके लगेंगे, नया संदेश जाएगा कि सब ठीक है। क्योंकि कांग्रेस में एक बात वर्षों से स्थायी है, गहलोत और पायलट की राजनीति में दूरी कभी पूरी तरह खत्म नहीं होती, बस कैमरे के फ्रेम के हिसाब से कम-ज्यादा होती रहती है।
फिलहाल तस्वीर यही कह रही है, राजस्थान कांग्रेस में सब ठीक है। और राजनीति का अनुभव कह रहा है, “जब बार-बार बताना पड़े कि सब ठीक है, तब समझ लीजिए कहीं न कहीं कुछ ठीक नहीं है!”
