Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute: राजस्थान के प्रसिद्ध श्री महावीर जी जैन मंदिर के प्रबंधन को लेकर श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय के बीच लंबे समय से चल रहे कानूनी विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक सूची में मामला Prabandhkarini Committee Digambar Jain Atishya Kshetra Shri Mahaveerji vs Shri Sanjeev Palliwal, SLP(C) 23209-23210/2026 के रूप में दर्ज है।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों से धार्मिक विवाद को संवेदनशीलता के साथ देखने की अपील की। कोर्ट ने सवाल किया कि जिस भगवान के नाम पर दोनों पक्ष मुकदमा लड़ रहे हैं, क्या वे इस तरह की लंबी कानूनी लड़ाई से प्रसन्न होंगे?
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute की सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने दोनों संप्रदायों को आपसी मतभेद खत्म करने की दिशा में सोचने की सलाह दी।
कोर्ट ने उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या ऐसी कोई व्यवस्था संभव हो सकती है जिसमें दोनों संप्रदाय अपनी-अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा कर सकें। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि मामला धार्मिक भावनाओं से जुड़ा है, इसलिए इसका समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे किसी भी पक्ष की आस्था प्रभावित न हो।
कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह था कि मंदिर के प्रशासन को लेकर जारी विवाद धार्मिक सौहार्द पर भारी नहीं पड़ना चाहिए।

आठ दिन में दाखिल करनी होंगी लिखित दलीलें
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पूरी करने के बाद दोनों पक्षों को आठ दिन के भीतर written submissions देने का निर्देश दिया है।
याचिकाकर्ता दिगंबर समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम पेश हुए, जबकि दूसरी ओर वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने दलीलें रखीं।
इसके बाद पीठ ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। अब दोनों पक्षों की अंतिम लिखित दलीलें मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा।
विवाद आखिर है किस बात को लेकर?
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute की जड़ मंदिर के प्रबंधन और प्रशासन से जुड़ी है।
मामला राजस्थान पब्लिक ट्रस्ट एक्ट, 1959 की धारा 40 के तहत शुरू हुई कार्यवाही से संबंधित है। इसमें मंदिर का प्रबंधन कर रही दिगंबर समिति के अध्यक्ष और सचिव को हटाने तथा श्वेतांबर समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली नई management committee बनाने समेत राहत मांगी गई थी।
इससे पहले मंदिर के management को लेकर एक आवेदन पर 1970 में Sub-Divisional Officer ने आदेश दिया था।
बाद में दिगंबर समिति ने Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 की धारा 4 का सहारा लिया। इसके बाद अक्टूबर 1994 में ट्रायल कोर्ट ने कार्यवाही को समाप्त यानी abate कर दिया था।

हाई कोर्ट के फैसले के बाद पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute मामला बाद में राजस्थान हाई कोर्ट पहुंचा।
दिगंबर समिति ने तर्क दिया कि 1991 के कानून के तहत कार्यवाही खत्म हो चुकी थी और उस कानून में appeal का प्रावधान नहीं था, इसलिए हाई कोर्ट में statutory appeal नहीं सुनी जानी चाहिए थी।
हालांकि राजस्थान हाई कोर्ट ने माना कि Rajasthan Public Trust Act की धारा 40 के तहत पारित आदेश decree की तरह है, इसलिए उसके खिलाफ वैधानिक अपील की जा सकती है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि 1991 के कानून के तहत proceedings abate होने से प्रभावित पक्ष का statutory right of appeal खत्म नहीं होता।
इसके बाद दिगंबर समिति सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
श्वेतांबर पक्ष की क्या दलील?
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute में श्याम दीवान ने दलील दी कि इस मामले में पूजा स्थल की धार्मिक पहचान बदलने या उसे किसी दूसरे स्वरूप में परिवर्तित करने की मांग नहीं है।
उनका कहना था कि विवाद मुख्य रूप से मंदिर के management और administration तक सीमित है और इसका उद्देश्य संपूर्ण जैन समुदाय के हित में व्यवस्था करना है। इसी आधार पर उन्होंने तर्क दिया कि Places of Worship Act, 1991 की रोक इस मामले में लागू नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने इस पक्ष से यह सवाल भी किया कि अगर प्रबंधन में बदलाव होता है तो क्या मौजूदा धार्मिक rituals और practices में बदलाव नहीं करने का भरोसा दिया जा सकता है।
दिगंबर समिति ने क्या कहा?
दिगंबर समिति की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता आर्यमा सुंदरम ने तर्क दिया कि मंदिर, देवता और उससे जुड़ी संपत्तियों का नियंत्रण, कब्जा और प्रबंधन ऐतिहासिक रूप से दिगंबर जैन संप्रदाय के पास रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि 1991 के कानून के तहत proceedings समाप्त होने के बाद हाई कोर्ट को statutory appeal पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी और दूसरे कानूनी विकल्प का इस्तेमाल किया जाना चाहिए था।
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute अब सुप्रीम कोर्ट को मुख्य रूप से इसी कानूनी विवाद पर फैसला करना है।
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute की बड़ी बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर प्रबंधन विवाद में फैसला सुरक्षित रखा।
- सुनवाई 9 सितंबर 2026 को हुई।
- जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामला सुना।
- दोनों पक्षों को आठ दिन में लिखित दलीलें देनी हैं।
- विवाद श्वेतांबर और दिगंबर जैन संप्रदायों के बीच मंदिर प्रबंधन को लेकर है।
- मामला Rajasthan Public Trust Act, 1959 और Places of Worship Act, 1991 से जुड़े कानूनी सवालों पर केंद्रित है।
- कोर्ट ने दोनों पक्षों को धार्मिक संवेदनशीलता बनाए रखने की सलाह दी।
- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या लंबे मुकदमे से भगवान प्रसन्न होंगे।
- मामले का नंबर SLP(C) 23209-23210/2026 है।
Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute: अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार
कुल मिलाकर Shree Mahavir Ji Jain Temple Dispute में दशकों पुराना प्रबंधन विवाद अब निर्णायक कानूनी पड़ाव पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर फैसला सुरक्षित रखा है, वहीं अदालत की टिप्पणियों से यह भी साफ है कि पीठ धार्मिक संवेदनशीलता और दोनों संप्रदायों के अधिकारों के बीच संतुलन चाहती है।
अब दोनों पक्ष आठ दिन में लिखित दलीलें दाखिल करेंगे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला यह तय करेगा कि मंदिर प्रबंधन विवाद में आगे कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाएगी।
आधिकारिक केस और आदेश संबंधी जानकारी के लिए Supreme Court of India देखा जा सकता है। राजस्थान की अन्य खबरों के लिए The News Canvas पढ़ें।

