Bankipur Jeet के साथ प्रशांत किशोर ने बिहार की राजनीति में अपनी चुनावी मौजूदगी दर्ज करा दी है। चुनावी रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में BJP उम्मीदवार नीरज कुमार को 19,324 वोटों से पराजित किया। इस नतीजे ने न केवल BJP का वर्षों पुराना किला ढहा दिया, बल्कि पटना की इसी सियासी जमीन पर 59 वर्ष पहले हुए एक बड़े उलटफेर की याद भी ताजा कर दी।
उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को 64,151 वोट मिले, जबकि BJP उम्मीदवार नीरज कुमार के खाते में 44,827 वोट आए। RJD उम्मीदवार रेखा कुमारी 14,273 मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहीं। प्रशांत किशोर की इस जीत को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि बांकीपुर लंबे समय से BJP की सबसे सुरक्षित सीटों में शामिल रहा है।
Bankipur Jeet ने याद दिलाया 1967 का चुनाव
प्रशांत किशोर की Bankipur Jeet के बाद वर्ष 1967 के बिहार विधानसभा चुनाव की चर्चा फिर शुरू हो गई है। उस समय वर्तमान बांकीपुर क्षेत्र से जुड़ा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था।
1967 के चुनाव में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में पटना पश्चिम से मैदान में उतरे थे। उनके सामने जन क्रांति दल के महामाया प्रसाद सिन्हा ने चुनाव लड़ा। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए सहाय को अपनी जीत का मजबूत भरोसा था, लेकिन चुनाव परिणाम ने बिहार की राजनीति को चौंका दिया।
महामाया प्रसाद सिन्हा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय को लगभग 20 हजार मतों के अंतर से पराजित कर दिया। यह जीत उस दौर में कांग्रेस के विरुद्ध बढ़ते जन असंतोष और गैर-कांग्रेसी राजनीतिक शक्तियों के उभार का बड़ा संकेत बनी।
1967 के बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़ी ऐतिहासिक जानकारी भारत निर्वाचन आयोग और सार्वजनिक चुनावी अभिलेखों से देखी जा सकती है।
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महामाया प्रसाद सिन्हा बने थे मुख्यमंत्री
पटना पश्चिम से कृष्ण बल्लभ सहाय को हराने के बाद महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार की राजनीति के प्रमुख चेहरे बनकर उभरे। 1967 के विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी जरूर बनी, लेकिन वह सरकार बनाने के लिए आवश्यक बहुमत हासिल नहीं कर सकी।
इसके बाद संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ, जन क्रांति दल, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और अन्य गैर-कांग्रेसी दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चे की सरकार बनाई। महामाया प्रसाद सिन्हा को इस गठबंधन का नेता चुना गया और उन्होंने 5 मार्च 1967 को बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।
इस तरह वह बिहार में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले दलों से बनी यह सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। इसके बावजूद महामाया प्रसाद सिन्हा की जीत ने बिहार में कांग्रेस के एकछत्र राजनीतिक प्रभाव को बड़ी चुनौती दी।
Bankipur Jeet– प्रशांत किशोर ने BJP का किला कैसे भेदा?
करीब छह दशक बाद प्रशांत किशोर की Bankipur Jeet में भी कुछ वैसा ही राजनीतिक संकेत दिखाई दे रहा है। इस बार सामने कोई मौजूदा मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं था, लेकिन बांकीपुर BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का मजबूत राजनीतिक गढ़ माना जाता रहा है।
नितिन नवीन ने इस क्षेत्र से लगातार कई विधानसभा चुनाव जीते थे। उनके राज्यसभा जाने और विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा देने के बाद बांकीपुर सीट खाली हुई थी। उपचुनाव में BJP ने नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया, जबकि जन सुराज पार्टी की ओर से प्रशांत किशोर स्वयं मैदान में उतरे।
उपचुनाव के परिणाम में प्रशांत किशोर ने शुरुआत से बढ़त बनाए रखी और सभी दौर की मतगणना पूरी होने के बाद 19,324 वोटों से चुनाव जीत लिया। इस नतीजे के साथ बांकीपुर में BJP का करीब तीन दशक से चला आ रहा दबदबा भी समाप्त हो गया।
बांकीपुर उपचुनाव के परिणाम और प्रत्याशियों को मिले वोटों की विस्तृत जानकारी आधिकारिक चुनाव परिणाम पोर्टल पर देखी जा सकती है।
दोनों चुनावों में दिखाई देती हैं ये समानताएं
1967 और 2026 के चुनावों की परिस्थितियां पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं, लेकिन दोनों नतीजों में कुछ दिलचस्प राजनीतिक समानताएं दिखाई देती हैं।
पहली समानता यह है कि दोनों चुनावों में स्थापित राजनीतिक ताकत को चुनौती मिली। महामाया प्रसाद सिन्हा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय को पराजित किया था, जबकि प्रशांत किशोर ने BJP के सबसे मजबूत गढ़ों में शामिल बांकीपुर में जीत हासिल की।
दूसरी समानता नए राजनीतिक विकल्प से जुड़ी है। 1967 में गैर-कांग्रेसी दल बिहार में कांग्रेस के विकल्प के रूप में उभर रहे थे। वहीं प्रशांत किशोर अपनी जन सुराज पार्टी को बिहार की पारंपरिक दलगत राजनीति से अलग विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।
तीसरी समानता जीत के अंतर की है। महामाया प्रसाद सिन्हा ने करीब 20 हजार मतों से तत्कालीन मुख्यमंत्री को हराया था। प्रशांत किशोर ने BJP उम्मीदवार को 19,324 मतों से मात दी। दोनों चुनावों का अंतर भी लगभग समान रहा।
जन सुराज को मिली पहली बड़ी चुनावी सफलता
प्रशांत किशोर की Bankipur Jeet जन सुराज पार्टी के लिए भी विशेष महत्व रखती है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अपेक्षित सफलता नहीं मिलने के बाद पार्टी के राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठ रहे थे। बांकीपुर के परिणाम ने जन सुराज को विधानसभा में प्रतिनिधित्व देने के साथ संगठन के कार्यकर्ताओं का मनोबल भी बढ़ाया है।
यह जीत प्रशांत किशोर के लिए चुनावी रणनीतिकार से निर्वाचित जनप्रतिनिधि बनने का महत्वपूर्ण पड़ाव है। अब उनके सामने अपने चुनावी वादों को जमीन पर उतारने और बांकीपुर के मतदाताओं की अपेक्षाओं को पूरा करने की चुनौती होगी।
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Bankipur Jeet– क्या बिहार में बदलेगा राजनीतिक समीकरण?
एक उपचुनाव के नतीजे के आधार पर पूरे बिहार की राजनीति का भविष्य तय नहीं किया जा सकता। फिर भी बांकीपुर जैसे शहरी और BJP समर्थक माने जाने वाले क्षेत्र में जन सुराज की जीत एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश जरूर देती है।
इस परिणाम से साफ है कि प्रशांत किशोर अब केवल चुनावी रणनीति तैयार करने वाले नेता नहीं रहे। उन्होंने प्रत्यक्ष चुनाव जीतकर बिहार की सक्रिय राजनीति में अपनी जगह बनाई है। आने वाले चुनावों में जन सुराज इस सफलता को राज्य के दूसरे हिस्सों तक पहुंचा पाएगी या नहीं, यह उसके संगठन, स्थानीय नेतृत्व और जनता के मुद्दों पर किए जाने वाले काम पर निर्भर करेगा।
फिलहाल प्रशांत किशोर की Bankipur Jeet ने 59 साल पुराने राजनीतिक इतिहास को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। वर्ष 1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा ने स्थापित सत्ता को चुनौती देकर बिहार की राजनीति बदली थी। अब 2026 में प्रशांत किशोर की जीत ने बांकीपुर को एक बार फिर बड़े राजनीतिक बदलाव का केंद्र बना दिया है।




