सियासत का नया गणित: सत्ता पहले, सिद्धांत बाद में

Rakesh Sharma - National Head
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भारतीय राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां सबसे बड़ा सवाल चुनावी रणनीति, विकास या जनहित नहीं, बल्कि राजनीतिक वफादारी का बन गया है। देश के अलग-अलग राज्यों में जिस तरह से दल-बदल की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं, उसने यह बहस तेज कर दी है कि क्या अब विचारधारा और सिद्धांत राजनीति के केंद्र से हट चुके हैं, और उनकी जगह सत्ता की संभावनाओं ने ले ली है।

आपको लेकर चलते हैं महाराष्ट्र से होते हुए पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश तक, जहां लगभग हर बड़े राजनीतिक दल के सामने अपने नेताओं और जनप्रतिनिधियों को साथ बनाए रखने की चुनौती खड़ी है। कभी जिस दल के लिए नेता मंचों से जोशीले भाषण देते थे, आज वही नेता दूसरे दलों के मंच पर खड़े दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह राजनीतिक परिपक्वता है, अवसरवाद है या बदलते राजनीतिक समीकरणों की मजबूरी?

महाराष्ट्र की राजनीति इसका सबसे ताजा उदाहरण बनकर सामने आई है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) पहले ही विभाजन का दर्द झेल चुकी है और अब उसके सांसदों के बीच बढ़ती असंतुष्टि की चर्चाएं फिर सुर्खियों में हैं। पार्टी नेतृत्व इसे राजनीतिक दबाव और सत्ता पक्ष की रणनीति बता रहा है, जबकि विरोधी इसे नेतृत्व की कमजोरी के रूप में पेश कर रहे हैं।

संजय राउत जैसे नेता खुले तौर पर दलबदल करने वालों पर निशाना साध रहे हैं और इसे विश्वासघात करार दे रहे हैं। लेकिन राजनीति के जानकार यह भी याद दिलाते हैं कि भारतीय राजनीति में दलबदल कोई नई घटना नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले इसे असाधारण माना जाता था, जबकि अब यह चुनावी गणित का एक सामान्य हिस्सा बन चुका है।

उत्तर प्रदेश में भी राजनीतिक गलियारों में इसी तरह की चर्चाएं गर्म हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के दावे राजनीतिक हलकों में नई बहस को जन्म दे रहे हैं। उनके अनुसार समाजवादी पार्टी के कई नेता और सांसद भाजपा के संपर्क में हैं। हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इतना जरूर है कि इस तरह की चर्चाएं विपक्षी दलों की चिंताओं को बढ़ाने का काम कर रही हैं।

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार यह दावा कर रहे हैं कि उनकी पार्टी पूरी तरह एकजुट है और भाजपा पर विपक्षी दलों को तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन भारतीय राजनीति का अनुभव बताता है कि जब किसी दल को बार-बार अपनी एकजुटता साबित करनी पड़े, तो राजनीतिक विश्लेषक उसके भीतर चल रही हलचलों को नजरअंदाज नहीं करते।

असल समस्या सिर्फ दल-बदल नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि जिन नेताओं को जनता एक विचारधारा, एक राजनीतिक सोच और एक पार्टी के एजेंडे के आधार पर चुनकर भेजती है, वे अचानक अपना राजनीतिक रास्ता कैसे बदल लेते हैं? यदि विचारधारा इतनी आसानी से बदल सकती है, तो फिर चुनावी भाषणों, घोषणापत्रों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का वास्तविक महत्व क्या रह जाता है?

आज भारतीय राजनीति में एक नई प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। दल बदलने वाले नेता इसे राजनीतिक मजबूरी या विकास की राजनीति बताते हैं, जबकि उनके विरोधी इसे अवसरवाद कहते हैं। सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं मौजूद है। लेकिन इतना स्पष्ट है कि जनता के बीच राजनीति की विश्वसनीयता इस प्रक्रिया से लगातार प्रभावित हो रही है।

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष की खबरें हों, महाराष्ट्र में लगातार बदलते राजनीतिक समीकरण हों या उत्तर प्रदेश में संभावित दलबदल की अटकलें—इन सभी घटनाओं का एक साझा संदेश है कि भारतीय राजनीति का केंद्र अब विचारधारा से अधिक सत्ता की संभावनाओं की ओर झुकता दिखाई दे रहा है।

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और उससे पहले आने वाले विभिन्न चुनाव इस प्रवृत्ति को और तेज कर सकते हैं। टिकट वितरण, राजनीतिक समीकरण और सत्ता की संभावनाएं आने वाले समय में कई नए राजनीतिक प्रयोगों और गठबंधनों को जन्म दे सकती हैं।

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का बदलना या नेताओं का नए विकल्प तलाशना असामान्य नहीं है। लेकिन जब दल-बदल राजनीतिक संस्कृति का स्थायी हिस्सा बन जाए, तब यह चिंता का विषय बन जाता है। क्योंकि लोकतंत्र की मजबूती सिर्फ चुनावों से नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिबद्धता और जनता के विश्वास से भी तय होती है।

आज स्थिति यह है कि राजनीतिक दल अपने विरोधियों पर नेताओं को तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं और नेता अपने फैसलों को जनहित का नाम दे रहे हैं। लेकिन आम मतदाता अब पहले से ज्यादा सतर्क है। वह यह समझने लगा है कि राजनीतिक बयान और राजनीतिक फैसले हमेशा एक जैसे नहीं होते।

आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि क्या राजनीतिक दल विचारधारा और संगठनात्मक निष्ठा को बचा पाएंगे, या फिर राजनीति पूरी तरह सत्ता केंद्रित गणित में बदल जाएगी। फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि दल-बदल की इस राजनीति में जनता अभी भी उस नेतृत्व की तलाश कर रही है, जो परिस्थितियों के अनुसार दल नहीं, बल्कि सिद्धांत बदलने से इनकार करे।

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