Supreme Court CSAM Guidelines: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों से जुड़ी यौन शोषण सामग्री यानी Child Sexual Exploitation and Abuse Material (CSEAM/CSAM) की पहचान और रिपोर्टिंग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सख्त जवाब मांगा है। गुरुवार, 24 सितंबर 2026 को जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) और कानून एवं न्याय मंत्रालय को दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का आखिरी मौका दिया। अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को होगी।
अदालत ने साफ किया कि केंद्र की रिपोर्ट में यह बताया जाए कि सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के फैसले को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं, सोशल मीडिया intermediaries की reporting में कथित खामियों को रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनाई गई है और भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो, इसके लिए सरकार क्या precautions लेने जा रही है।
Supreme Court CSAM Guidelines पर कोर्ट ने क्यों जताई नाराजगी?
Supreme Court CSAM Guidelines से जुड़ी कार्यवाही में अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि 14 अगस्त 2026 के आदेश के बावजूद केंद्र की counter affidavit या detailed report रिकॉर्ड पर नहीं आई थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस पार्डीवाला ने केंद्र से पूछा कि रिपोर्ट और affidavit कहां है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने बताया कि सरकार रिपोर्ट को अंतिम रूप दे रही है और इसे दाखिल करने के लिए कुछ और समय चाहिए। पीठ ने मामले को बेहद गंभीर बताते हुए दोनों मंत्रालयों को आखिरी मौका दिया।
14 अगस्त के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने MeitY और कानून मंत्रालय को पक्षकार बनाते हुए उनसे जवाब मांगा था। उस आवेदन में सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा IT Act के तहत due diligence और POCSO Act के तहत mandatory reporting obligations के पालन में कथित कमी का मुद्दा उठाया गया था।
Supreme Court CSAM Guidelines: सिर्फ कंटेंट हटाना काफी नहीं, रिपोर्टिंग भी जरूरी
इस मामले का बड़ा सवाल केवल सोशल मीडिया से आपत्तिजनक सामग्री हटाने का नहीं है।
याचिका में मांग की गई है कि एक uniform Standard Operating Procedure (SOP) तैयार की जाए, जिसमें CSEAM की पहचान से लेकर पुलिस को सूचना देने तक पूरी प्रक्रिया स्पष्ट हो।
प्रस्तावित व्यवस्था में इन बिंदुओं को शामिल करने की मांग है:
- ऐसी सामग्री की detection और reporting
- competent law-enforcement agency को mandatory reporting
- reporting की समय सीमा
- digital evidence को सुरक्षित रखना
- IP address और account details सुरक्षित रखना
- investigating agencies के साथ information sharing
- विभिन्न एजेंसियों के बीच coordination
- पीड़ित बच्चे की सुरक्षा से जुड़े safeguards
14 अगस्त के सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में इन मांगों का विस्तार से उल्लेख किया गया है।
बच्चे की पहचान और सुरक्षा को भी SOP का हिस्सा बनाने की मांग
Supreme Court CSAM Guidelines से जुड़ी मौजूदा कार्यवाही में child protection को reporting system के केंद्र में रखने की मांग भी उठी है।
एक intervention application में तर्क दिया गया है कि किसी प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री मिलने के बाद जांच केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रहनी चाहिए कि सामग्री किस account से upload हुई या किस IP address का इस्तेमाल हुआ।
इसके साथ यह पता लगाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए कि सामग्री में दिखाई देने वाला बच्चा कौन है, वह इस समय सुरक्षित है या नहीं और उसे तत्काल rescue, care या protection की जरूरत तो नहीं है।
यानी प्रस्तावित SOP में digital investigation के साथ victim identification, protection, investigation और rehabilitation को भी महत्व देने की मांग है।
Supreme Court CSAM Guidelines: याचिकाकर्ता तैयार कर सकेगा Draft SOP
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में याचिकाकर्ता को प्रस्तावित SOP तैयार करने में अदालत की सहायता करने और एक draft प्रस्तुत करने की अनुमति भी दी है।
अदालत ने कहा कि draft की copy केंद्र को दी जा सकती है। सरकार इसका अध्ययन करेगी और अगर उसमें कोई कमी या बदलाव की जरूरत होगी तो अगली सुनवाई में उस पर विचार किया जा सकेगा।
इसका मतलब यह नहीं है कि कोई नई guideline अभी लागू हो गई है। फिलहाल SOP तैयार करने और उसकी संरचना तय करने की न्यायिक प्रक्रिया जारी है।
Supreme Court CSAM Guidelines: 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि सुप्रीम कोर्ट के 23 सितंबर 2024 के महत्वपूर्ण फैसले से जुड़ी है।
Just Rights for Children Alliance & Anr. v. S. Harish & Ors. मामले में सुप्रीम कोर्ट ने social media intermediaries की जिम्मेदारी पर विस्तार से चर्चा की थी। अदालत ने कहा था कि IT Act की धारा 79 के तहत मिलने वाली safe harbour protection बिना शर्त नहीं है।
Intermediaries को कानून के तहत due diligence का पालन करना होगा और POCSO Act तथा उसके Rules के तहत लागू reporting obligations का भी पालन करना होगा।
NCMEC को रिपोर्ट करना ही पर्याप्त नहीं
Supreme Court CSAM Guidelines मामले का सबसे अहम कानूनी सवाल reporting system को लेकर है।
2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि social media intermediaries यदि अमेरिका स्थित National Center for Missing & Exploited Children (NCMEC) को ऐसी सामग्री की सूचना देते हैं, तो इससे भारत में उनकी reporting obligation खत्म नहीं होती।
अदालत के अनुसार intermediaries को POCSO Act की धारा 19 के तहत Special Juvenile Police Unit (SJPU) या स्थानीय पुलिस को भी सूचना देनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि due diligence में केवल सामग्री हटाना शामिल नहीं है, बल्कि ऐसी सामग्री मिलने पर संबंधित भारतीय authorities को तत्काल report करना भी महत्वपूर्ण है।
Supreme Court CSAM Guidelines: POCSO की धारा 19 और 20 क्यों महत्वपूर्ण?
POCSO Act की reporting provisions बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों की जानकारी authorities तक पहुंचाने के लिए बनाई गई हैं।
मौजूदा याचिका में आरोप लगाया गया है कि कुछ platforms NCMEC को information भेज रहे हैं, लेकिन भारत में SJPU या local police तक उसी समय जानकारी पहुंचने की प्रक्रिया में कमी हो सकती है।
इसी वजह से याचिकाकर्ता एक ऐसी centralized और uniform system की मांग कर रहे हैं जिसमें platform से लेकर investigation agency तक reporting की chain स्पष्ट हो।
याचिका में एक secure centralized online reporting portal स्थापित करने की भी मांग है, जिसमें offending account, URL, upload time, IP address, device identifier, metadata और अन्य relevant electronic evidence law-enforcement agencies तक पहुंचाया जा सके।
Supreme Court CSAM Guidelines: Google और Meta को लेकर क्या अपडेट है?
इस बीच reporting system में एक महत्वपूर्ण बदलाव भी सामने आया है।
Reuters की 21 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक Google ने भारत से जुड़े CSAM मामलों की रिपोर्ट सीधे भारतीय authorities को देना शुरू करने की योजना बताई है। Meta भी इसी तरह direct reporting की दिशा में कदम उठा चुका है। इससे पहले global reporting का बड़ा हिस्सा NCMEC के जरिए route होता था।
24 सितंबर की सुनवाई में याचिकाकर्ता की ओर से भी कहा गया कि हाल में Google और Meta ने Indian authorities के साथ सीधे information sharing की दिशा में कदम उठाए हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट में उठाया गया मुद्दा किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं है। प्रस्तावित SOP सभी संबंधित intermediaries के लिए uniform reporting mechanism बनाने की मांग से जुड़ा है।
Supreme Court CSAM Guidelines: Paid Ads का मुद्दा भी आया सामने
सोशल मीडिया पर CSEAM से जुड़े alleged paid advertisements की रिपोर्टों ने भी इस मामले को और गंभीर बनाया है।
14 अगस्त के आवेदन में अदालत को बताया गया था कि कुछ reports में ऐसे paid advertisements का आरोप लगाया गया है, जिनसे users को दूसरी websites या platforms की ओर redirect किया जाता था, जहां कथित रूप से ऐसी सामग्री उपलब्ध कराई जा रही थी।
जुलाई 2026 में MeitY ने Meta-owned Instagram को notice जारी कर ऐसे advertisements और content को हटाने तथा यह बताने को कहा था कि वे platform पर कैसे दिखाई दिए।
सितंबर में National Human Rights Commission ने भी इस मुद्दे पर MeitY, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से action-taken report मांगी।
Supreme Court CSAM Guidelines में केंद्र से क्या मांगा गया?
24 सितंबर की सुनवाई के बाद केंद्र की रिपोर्ट में मुख्य रूप से तीन बातों का जवाब अपेक्षित है:
- 2024 के सुप्रीम कोर्ट फैसले को लागू करने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए?
- सोशल मीडिया पर CSEAM की समस्या और reporting lapses को रोकने के लिए सरकार ने क्या कार्रवाई की?
- भविष्य में intermediaries की ओर से ऐसी कमी दोबारा न हो, इसके लिए कौन से safeguards और precautions लागू किए जाएंगे?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केंद्र की रिपोर्ट अगली सुनवाई से कम से कम चार-पांच दिन पहले संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराई जाए। मामला 15 अक्टूबर 2026 को फिर सुना जाएगा।
Supreme Court CSAM Guidelines की बड़ी बातें
- सुप्रीम कोर्ट में 24 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई हुई।
- जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ मामले की सुनवाई कर रही है।
- केंद्र ने अभी तक मांगी गई detailed report दाखिल नहीं की थी।
- अदालत ने सरकार को दो सप्ताह का आखिरी मौका दिया।
- अगली सुनवाई 15 अक्टूबर 2026 को होगी।
- Uniform SOP बनाने की मांग की गई है।
- SOP में detection, reporting, evidence preservation और victim-centric safeguards शामिल करने की मांग है।
- याचिकाकर्ता को draft SOP तैयार कर अदालत की मदद करने की अनुमति मिली है।
- 2024 के फैसले के मुताबिक NCMEC को report करना भारतीय पुलिस को report करने का विकल्प नहीं है।
- Social media intermediaries को POCSO के तहत SJPU या local police को भी सूचना देनी होगी।
- Google और Meta ने भारत में direct reporting की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।
Supreme Court CSAM Guidelines: क्या अब नई गाइडलाइन लागू होने वाली है?
फिलहाल Supreme Court CSAM Guidelines को लेकर यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोई नई guideline लागू हो गई है। अभी अदालत ने केंद्र से detailed report मांगी है और proposed SOP पर विचार चल रहा है।
15 अक्टूबर की अगली सुनवाई में केंद्र का जवाब, याचिकाकर्ता का draft SOP और reporting mechanism से जुड़े सुझाव सामने आने के बाद आगे की दिशा ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। अदालत का मुख्य फोकस यह सुनिश्चित करने पर है कि social media platform पर ऐसी सामग्री मिलने के बाद केवल उसे हटाया न जाए, बल्कि कानून के मुताबिक authorities को समय पर सूचना मिले और संबंधित बच्चे की सुरक्षा के लिए भी तुरंत कार्रवाई हो।
आधिकारिक न्यायिक जानकारी के लिए Supreme Court of India और cybercrime reporting के लिए National Cyber Crime Reporting Portal देखा जा सकता है।
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