Sarpanch Sarla Kumawat: जयपुर जिले के जोबनेर क्षेत्र की आसलपुर ग्राम पंचायत में सड़क, नाली, पेयजल और शिक्षा जैसे बुनियादी मुद्दों पर किए गए कार्यों ने महिला सरपंच सरला कुमावत को प्रदेश स्तर पर पहचान दिलाई है। पांच साल के अपने कार्यकाल को याद करते हुए सरला बताती हैं कि राजनीति में आने से पहले उन्हें पंचायत के कामकाज का अनुभव नहीं था, लेकिन ग्रामीणों की अपेक्षाओं ने उन्हें लगातार काम करने के लिए प्रेरित किया।
उनके इन्हीं प्रयासों को राजस्थान सरकार ने भी मान्यता दी है। 2 अक्टूबर को जयपुर के तक्षशिला ऑडिटोरियम में आयोजित पंचायतीराज जनप्रतिनिधि संवाद कार्यक्रम में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने आसलपुर की सरला कुमावत को ग्राम पंचायत में विकास कार्यों और विशेष उपलब्धियों के लिए संदेश पत्र देकर सम्मानित किया। मुख्यमंत्री कार्यालय ने भी सम्मानित जनप्रतिनिधियों की सूची में सरला कुमावत का नाम दर्ज किया है।
Sarpanch Sarla Kumawat को मुख्यमंत्री ने किया सम्मानित
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पंचायतीराज जनप्रतिनिधियों से संवाद के दौरान कहा कि गांव के किसी व्यक्ति की समस्या और उम्मीद का पहला केंद्र सरपंच होता है। इसी कार्यक्रम में प्रदेश की चुनिंदा ग्राम पंचायतों में बेहतर काम करने वाले जनप्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया।
इनमें देवलिया की स्वरूप चौधरी, रूण्डल की मोहिनी देवी, बोराज के सुरेंद्र सिंह मीणा, आसलपुर की सरला कुमावत और साईवाड़ के राजेंद्र बुनकर शामिल रहे।
सरला कुमावत के लिए यह सम्मान उनके पांच साल के कार्यकाल की खास उपलब्धियों में शामिल हो गया है। उनका कहना है कि यह सम्मान केवल उनका नहीं, बल्कि पंचायत के अन्य जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का भी है, जिन्होंने विकास कार्यों में सहयोग किया।
Sarpanch Sarla Kumawat: पेयजल थी गांव की सबसे बड़ी चुनौती
सरला कुमावत के मुताबिक सरपंच बनने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी समस्याओं में से एक पेयजल की थी।
वह बताती हैं कि पंचायत समिति की बैठकों और विभागीय अधिकारियों के सामने लगातार इस मुद्दे को उठाया गया। इसके बाद गांव में पेयजल व्यवस्था बेहतर करने की दिशा में काम आगे बढ़ा और पाइपलाइन के जरिए घरों तक पानी पहुंचाने के प्रयास किए गए।
सरला का कहना है कि पहले ग्रामीणों को मीठे और साफ पानी के लिए परेशानी उठानी पड़ती थी, लेकिन नई व्यवस्था से स्थिति में सुधार हुआ है।
इस पेयजल व्यवस्था की लागत, योजना और कवरेज से जुड़े विस्तृत आंकड़ों की स्वतंत्र सरकारी पुष्टि उपलब्ध नहीं मिली है, इसलिए इन्हें सरपंच की ओर से साझा किए गए स्थानीय विकास विवरण के रूप में देखा जाना चाहिए।
गलियों में CC सड़क और पक्की नालियों पर जोर
Sarpanch Sarla Kumawat के अनुसार उनके कार्यकाल में गांव की गलियों और जल निकासी व्यवस्था पर विशेष ध्यान दिया गया।
उनका दावा है कि आसलपुर की करीब 80 प्रतिशत गलियों में CC सड़क और पक्की नालियों का निर्माण हो चुका है। अलग-अलग मोहल्लों में सड़क निर्माण के साथ पानी निकासी की व्यवस्था सुधारने की कोशिश की गई।
आसलपुर में गौरव पथ का निर्माण पहले भी सरकारी सड़क योजनाओं के तहत दर्ज है। राजस्थान के बजट दस्तावेज में ग्राम पंचायत आसलपुर में संपर्क सड़क से मुख्य आबादी तक गौरव पथ निर्माण कार्य का उल्लेख मिलता है।
सरला का कहना है कि सड़क और नालियों का निर्माण होने से बरसात के दिनों में ग्रामीणों को होने वाली परेशानी कम हुई और गांव का स्वरूप भी बदला है।
Sarpanch Sarla Kumawat: पंचायत भवन में बैठकर सुनीं लोगों की समस्याएं
सरला कुमावत बताती हैं कि पंचायत व्यवस्था को समझना उनके लिए शुरुआत में आसान नहीं था।
उनके मुताबिक पहले करीब एक साल में पंचायत की प्रशासनिक प्रक्रिया, सरकारी योजनाओं और विभागीय व्यवस्था को समझने में काफी समय लगा।
इसके बाद उन्होंने पंचायत भवन में नियमित रूप से बैठकर लोगों की समस्याएं सुनना शुरू किया। उनका कहना है कि जिन समस्याओं का पंचायत स्तर पर समाधान संभव होता था, उन्हें वहीं हल करने का प्रयास किया जाता था, जबकि दूसरे मामलों में संबंधित अधिकारियों से संपर्क किया जाता था।
सरला का मानना है कि सरपंच का असली काम केवल निर्माण कार्य कराना नहीं बल्कि लोगों के बीच उपलब्ध रहना भी है।
‘सूर्यवंशम’ फिल्म से मिली जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा
सरला कुमावत अपने राजनीतिक और व्यक्तिगत सफर में अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘सूर्यवंशम’ का भी जिक्र करती हैं।
उनका कहना है कि फिल्म में परिवार की बहू जिस तरह घर की जिम्मेदारियों और सामाजिक परिस्थितियों के बीच अपनी भूमिका निभाती है, उससे उन्हें भी प्रेरणा मिली।
सरला के मुताबिक उन्होंने कोशिश की कि परिवार की बहू और गांव की सरपंच—दोनों भूमिकाओं को साथ लेकर चला जाए।
वह कहती हैं कि राजनीति में आने वाली अपने परिवार की पहली महिला होने के कारण शुरुआत में उनके सामने कई सवाल थे। सबसे बड़ी चिंता यही थी कि लोगों ने जिस भरोसे के साथ उन्हें चुना है, उसे पूरा कैसे किया जाए।
‘छोटी बहू’ से ‘सरपंच साहिबा’ तक
सरला अपने सफर का एक दिलचस्प अनुभव भी साझा करती हैं।
उनके मुताबिक पहले उनके ससुर उन्हें प्यार से “छोटी बहू” कहकर बुलाते थे, लेकिन सरपंच बनने और गांव में काम करने के बाद वे उन्हें “सरपंच साहिबा” कहने लगे।
सरला के लिए यह बदलाव केवल संबोधन का नहीं बल्कि परिवार और समाज में एक महिला की स्वतंत्र पहचान बनने का प्रतीक है।
शिक्षा और महिला सशक्तिकरण पर फोकस
Sarpanch Sarla Kumawat का कहना है कि सड़क और पानी के साथ शिक्षा भी गांव के विकास की बुनियादी जरूरत है।
उन्होंने विशेष रूप से बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही। उनका मानना है कि गांवों में महिलाओं और बेटियों को शिक्षा से जोड़ना आने वाले वर्षों के सामाजिक बदलाव की नींव है।
वह महिलाओं से भी आगे आने की अपील करती हैं। उनके मुताबिक पंचायत या राजनीति में ताकत केवल पद से नहीं मिलती, बल्कि महिला के आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता से आती है।
जनसहभागिता से श्मशान घाटों का विकास
सरला के मुताबिक ग्राम पंचायत क्षेत्र में श्मशान घाटों के विकास में ग्रामीणों की भागीदारी भी ली गई।
उनका मानना है कि पंचायत के पास उपलब्ध सरकारी संसाधनों के साथ यदि ग्रामीण खुद भी विकास कार्यों में हिस्सा लें तो कई काम तेजी से पूरे किए जा सकते हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने जनसहभागिता को पंचायत के विकास कार्यों से जोड़ने का प्रयास किया।
सरपंच का कार्यकाल 10 साल करने की वकालत
सरला कुमावत का मानना है कि ग्राम पंचायत के निर्वाचित सरपंच के लिए पांच साल का कार्यकाल कई बार पर्याप्त नहीं होता।
उनके मुताबिक शुरुआती समय सरकारी प्रक्रियाओं और पंचायत व्यवस्था को समझने में निकल जाता है। जब तक जनप्रतिनिधि व्यवस्था को पूरी तरह समझता है, तब तक कार्यकाल का बड़ा हिस्सा बीत चुका होता है।
इसी आधार पर वह सुझाव देती हैं कि सरपंच का कार्यकाल दस साल होने पर गांव के लिए लंबी अवधि की योजनाएं बनाना और उन्हें पूरा करना आसान हो सकता है।
यह उनका व्यक्तिगत सुझाव है; मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में पंचायतों का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष निर्धारित है।
रोजगार केंद्र का सपना अब भी अधूरा
कई विकास कार्य पूरे होने के बावजूद सरला मानती हैं कि गांव में कुछ महत्वपूर्ण काम अभी बाकी हैं।
इनमें सबसे बड़ा सपना स्थानीय स्तर पर रोजगार केंद्र विकसित करने का है।
उनका कहना है कि गांव के युवाओं को रोजगार के लिए बाहर जाना पड़ता है। यदि स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग, प्रशिक्षण या रोजगार से जुड़े अवसर विकसित किए जाएं तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा हो सकता है।
वह कहती हैं कि सरपंच की कुर्सी रहे या नहीं, गांव के लिए काम करने का उनका प्रयास जारी रहेगा।
आसलपुर की पहचान है मां आशापुरा मंदिर
आसलपुर की पहचान केवल पंचायत के विकास कार्यों से नहीं बल्कि धार्मिक पर्यटन से भी जुड़ी है।
जोबनेर क्षेत्र के आसलपुर में करीब 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर मां आशापुरा का मंदिर स्थित है। नवरात्र के दौरान यहां जयपुर ग्रामीण समेत राजस्थान के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु पहुंचते हैं। पुराने स्थानीय विवरणों के मुताबिक मंदिर तक पहुंचने के लिए जनसहयोग से करीब 410 सीढ़ियां भी बनाई गई थीं।
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर से जुड़ी कई पुरानी मान्यताएं हैं और यह क्षेत्र का प्रमुख आस्था केंद्र है।
मंदिर क्षेत्र में सुविधाओं की अभी जरूरत
सरला और स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि मंदिर की धार्मिक महत्ता को देखते हुए यहां पर्यटन और श्रद्धालु सुविधाओं का और विस्तार होना चाहिए।
परिक्रमा क्षेत्र में lighting, बैठने की व्यवस्था और अन्य बुनियादी सुविधाओं की मांग की जाती रही है। इसके अलावा आसलपुर-जोबनेर रेलवे स्टेशन पर ज्यादा यात्री ट्रेनों के ठहराव की मांग भी स्थानीय स्तर पर उठती रही है।
इन सुविधाओं के विकसित होने से धार्मिक पर्यटन के साथ स्थानीय रोजगार के नए अवसर भी तैयार हो सकते हैं।
‘ताकत कुर्सी में नहीं, महिला में होती है’
अपने पांच साल के अनुभव को लेकर Sarpanch Sarla Kumawat का संदेश महिलाओं के लिए सीधा है—ताकत किसी पद या कुर्सी में नहीं होती।
उनका कहना है कि जिस तरह महिला परिवार को संभालती है, उसी तरह एक महिला सरपंच के लिए पूरा गांव परिवार की तरह होता है।
आसलपुर में सड़क, नाली, पेयजल, शिक्षा और जनसहभागिता जैसे क्षेत्रों में किए गए उनके प्रयासों को अब राज्य स्तर पर भी पहचान मिली है। मुख्यमंत्री की ओर से मिला सम्मान उसी सफर का नया पड़ाव है।
सरला कुमावत का कहना है कि कई सपने अभी पूरे होने बाकी हैं, लेकिन गांव की विकास यात्रा किसी एक कार्यकाल या पद के साथ खत्म नहीं होती।
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संवाददाता: अजय सिंह (चिंटू), आसलपुर-जोबनेर

