चेन्नई की CBI विशेष अदालत ने SBI की चेंगम शाखा के दो पूर्व अधिकारियों और छह निजी व्यक्तियों को कठोर कारावास की सजा सुनाई। 728 फर्जी डेयरी ऋणों से जुड़े मामले में दोषियों पर कुल ₹3.10 करोड़ का जुर्माना भी लगाया गया है।
चेन्नई। केंद्रीय जांच ब्यूरो की विशेष अदालत ने भारतीय स्टेट बैंक की चेंगम शाखा में हुए ₹1.97 करोड़ के डेयरी लोन घोटाले में दो पूर्व बैंक अधिकारियों सहित आठ लोगों को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक को 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत का फैसला 31 जुलाई 2026 को आया।
मामला वर्ष 2007-08 में कथित उधारकर्ताओं के नाम पर 728 डेयरी ऋण स्वीकृत करने से जुड़ा है। CBI जांच में सामने आया था कि जाली आवेदन और ऋण दस्तावेजों के आधार पर करीब ₹2.33 करोड़ के कर्ज मंजूर किए गए, जिससे SBI को ₹1,97,27,692 का नुकसान हुआ।
किन लोगों को मिली सजा?
अदालत ने SBI की चेंगम शाखा के तत्कालीन शाखा प्रबंधक एन. गोपालकृष्णन और तत्कालीन ग्रामीण विपणन एवं वसूली अधिकारी पी. बालामुरली को दोषी ठहराया है।
इनके अलावा छह निजी व्यक्तियों को भी 10-10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई:
- आर. वेंकटरमण
- एस. रवि
- डी. शंकर
- आर. राजन
- पी. पन्नीरसेल्वम
- टी. मुरुगन
सभी आठ दोषियों को समान अवधि की जेल की सजा सुनाई गई है।
पांच दोषियों पर ₹50-50 लाख का जुर्माना
अदालत ने एन. गोपालकृष्णन, पी. बालामुरली, आर. वेंकटरमण, एस. रवि और डी. शंकर पर ₹50-50 लाख का जुर्माना लगाया है।
आर. राजन, पी. पन्नीरसेल्वम और टी. मुरुगन पर ₹20-20 लाख का जुर्माना लगाया गया। इस प्रकार आठों दोषियों पर लगाए गए जुर्माने की कुल राशि ₹3.10 करोड़ बनती है।
| दोषी | तत्कालीन भूमिका | जुर्माना |
|---|---|---|
| एन. गोपालकृष्णन | SBI शाखा प्रबंधक | ₹50 लाख |
| पी. बालामुरली | ग्रामीण विपणन एवं वसूली अधिकारी | ₹50 लाख |
| आर. वेंकटरमण | निजी व्यक्ति | ₹50 लाख |
| एस. रवि | निजी व्यक्ति | ₹50 लाख |
| डी. शंकर | निजी व्यक्ति | ₹50 लाख |
| आर. राजन | निजी व्यक्ति | ₹20 लाख |
| पी. पन्नीरसेल्वम | निजी व्यक्ति | ₹20 लाख |
| टी. मुरुगन | निजी व्यक्ति | ₹20 लाख |
कैसे हुआ था डेयरी लोन घोटाला?
CBI के अनुसार अक्टूबर 2007 से मई 2008 के बीच SBI की चेंगम शाखा के तत्कालीन अधिकारियों ने कंथम्मा मिल्क चिलिंग प्लांट के मालिक के. पुरुषोत्तमन और अन्य लोगों के साथ मिलकर 728 डेयरी ऋण स्वीकृत किए थे।
ये ऋण बैंक, कथित उधारकर्ताओं और मिल्क चिलिंग प्लांट के बीच एक Tripartite Arrangement के तहत दिए गए थे। जांच में आरोप सामने आया कि कई आवेदन और ऋण दस्तावेज ऐसे लोगों के नाम पर तैयार किए गए, जिन्हें रिकॉर्ड में उधारकर्ता बताया गया था। इनमें फर्जी और जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
CBI ने यह भी पाया कि ऋण स्वीकृत करने से पहले और रकम जारी होने के बाद पूरी की जाने वाली अनिवार्य बैंकिंग प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। इन्हीं अनियमितताओं के कारण बैंक की ₹1.97 करोड़ से अधिक की राशि वापस नहीं आ सकी।
₹2.33 करोड़ के ऋण, बैंक को ₹1.97 करोड़ का नुकसान
जांच के अनुसार 728 खातों के माध्यम से कुल ₹2,32,96,000 के डेयरी ऋण स्वीकृत किए गए थे। इन लेन-देन से SBI को ₹1,97,27,692 की Wrongful Loss हुई।
इसलिए खबर के शीर्षक में इसे केवल “लाखों का घोटाला” कहने के बजाय ₹1.97 करोड़ का बैंक लोन घोटाला लिखना अधिक सटीक है।
वर्ष 2011 में दर्ज हुआ था मामला
SBI के Region-V, चेंगलपट्टू के क्षेत्रीय प्रबंधक की शिकायत पर CBI ने 23 सितंबर 2011 को मामला दर्ज किया था। इसके बाद बैंक खातों, ऋण आवेदनों, स्वीकृति दस्तावेजों और संबंधित रिकॉर्ड की जांच की गई।
जांच पूरी होने के बाद CBI ने 25 जून 2013 को कुल 10 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। विशेष अदालत ने 1 मई 2016 को उनके खिलाफ आरोप तय किए थे। इस तरह शिकायत दर्ज होने से अंतिम फैसला आने तक मामले में करीब 15 वर्ष लगे।
दो आरोपियों की सुनवाई के दौरान मृत्यु
मूल आरोपपत्र में कंथम्मा मिल्क चिलिंग प्लांट के मालिक के. पुरुषोत्तमन और SBI के तत्कालीन उप प्रबंधक (Advances) के. रविचंद्रन भी आरोपी थे।
सुनवाई लंबित रहने के दौरान दोनों की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी गई। अदालत ने शेष आठ आरोपियों के खिलाफ सुनवाई पूरी कर उन्हें दोषी ठहराया।
बैंक अधिकारियों की भूमिका क्यों गंभीर?
बैंक ऋण स्वीकृति प्रक्रिया में शाखा प्रबंधक और संबंधित ऋण अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उन्हें आवेदक की पहचान, आय, प्रस्तावित गतिविधि, दस्तावेजों और ऋण चुकाने की क्षमता की जांच करनी होती है।
डेयरी जैसे कृषि आधारित ऋणों में पशुओं की खरीद, लाभार्थियों का सत्यापन, आपूर्तिकर्ता और दूध खरीदने वाली इकाई की भूमिका तथा ऋण जारी होने के बाद संपत्ति का निरीक्षण भी जरूरी होता है।
इस मामले में अदालत का फैसला दिखाता है कि बैंक अधिकारियों द्वारा अनिवार्य जांच प्रक्रिया की अनदेखी और निजी व्यक्तियों के साथ मिलीभगत को गंभीर आर्थिक अपराध माना गया।
छोटे ऋण खातों के जरिए बड़ी धोखाधड़ी
इस मामले की विशेषता यह थी कि घोटाला किसी एक बड़े Corporate Loan के माध्यम से नहीं, बल्कि 728 छोटे डेयरी ऋणों के जरिए किया गया। बड़ी संख्या में खातों और दस्तावेजों के कारण ऐसी अनियमितताओं का समय रहते पता लगाना कठिन हो सकता है।
छोटे कृषि और डेयरी ऋण ग्रामीण रोजगार और आजीविका को बढ़ावा देने के लिए दिए जाते हैं। फर्जी लाभार्थियों के नाम पर इन योजनाओं का दुरुपयोग होने से बैंक को नुकसान पहुंचने के साथ वास्तविक जरूरतमंदों के लिए उपलब्ध संसाधन भी प्रभावित होते हैं।
15 साल बाद आया फैसला
CBI ने वर्ष 2011 में मामला दर्ज किया था और अदालत का फैसला जुलाई 2026 में आया। लंबी सुनवाई के दौरान दस्तावेजी साक्ष्य, ऋण खाते, बैंक रिकॉर्ड और गवाहों के बयान अदालत के सामने रखे गए।
दो आरोपियों की मृत्यु के बाद भी शेष आठ लोगों के खिलाफ मुकदमा जारी रहा। अदालत ने सुनवाई और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों के आधार पर सभी आठ आरोपियों को दोषी मानते हुए कठोर सजा और भारी जुर्माना लगाया।




