नई दिल्ली। Bofors Scam: करीब चार दशक से भारतीय राजनीति और न्यायिक इतिहास में चर्चा का विषय रहे बोफोर्स मामले से जुड़ी आखिरी लंबित कानूनी लड़ाई भी अब समाप्त हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं को आरोपमुक्त करने के दिल्ली हाई कोर्ट के 2005 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
इस याचिका को अधिवक्ता अजय अग्रवाल ने दाखिल किया था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही बोफोर्स खरीद से जुड़े अदालत में लंबित आखिरी मामले का भी पटाक्षेप हो गया है। हालांकि, याचिकाकर्ता ने संकेत दिया है कि विस्तृत आदेश आने के बाद वह उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर विचार कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
Bofors Scam: हिंदुजा बंधुओं से जुड़े Bofors Scam की याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जेबी पार्डीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन शामिल थे।
अजय अग्रवाल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से खुद अदालत के सामने पेश हुए। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की ओर से अधिवक्ता रजत नायर अदालत में मौजूद थे।
सुनवाई की शुरुआत में सीबीआई की ओर से मामले को कुछ समय के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया गया। दलील दी गई कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता मामले में पेश होने वाले हैं और तत्काल उपलब्ध नहीं हैं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मामले को लंबे समय से लंबित होने का हवाला देते हुए सुनवाई टालने से इनकार कर दिया।
Bofors Scam: अदालत ने याचिकाकर्ता की भूमिका पर भी सवाल उठाया
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि आपराधिक मामले में अजय अग्रवाल की याचिका किस आधार पर सुनवाई योग्य है। अदालत ने पूछा कि वह इस मामले में तीसरे पक्ष हैं और आपराधिक मुकदमे में उनकी प्रत्यक्ष भूमिका क्या है।
सीबीआई की ओर से अदालत को बताया गया कि एजेंसी ने भी वर्ष 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए अपील दाखिल की थी। उस समय अदालत ने कहा था कि सीबीआई पहले से ही अजय अग्रवाल की याचिका में प्रतिवादी के रूप में शामिल है और उसे अपनी दलीलें उसी मामले में रखनी होंगी।
इन दलीलों के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को आगे लंबित रखने का आधार नहीं माना और याचिका खारिज कर दी।
2005 में हिंदुजा बंधुओं को मिली थी राहत
Bofors Scam में हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई को बड़ा झटका वर्ष 2005 में लगा था। दिल्ली हाई कोर्ट ने 31 मई 2005 को श्रीचंद हिंदुजा, गोपीचंद हिंदुजा और प्रकाश हिंदुजा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया था।
हाई कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सीबीआई की ओर से तत्काल अपील नहीं की गई। इसके बाद अधिवक्ता अजय अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी।
Bofors Scam यह याचिका लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित रही। अब शीर्ष अदालत द्वारा इसे खारिज किए जाने के बाद बोफोर्स से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम लंबित हिस्से के भी समाप्त होने की बात सामने आई है।
क्या था बोफोर्स घोटाला?
Bofors Scam 1980 के दशक के अंत में सामने आया था और इसने भारतीय राजनीति को हिलाकर रख दिया था। विवाद स्वीडन की हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स से भारत द्वारा तोपों की खरीद से जुड़ा था।
वर्ष 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि भारत को बोफोर्स तोपों की बिक्री के सौदे में कथित तौर पर कमीशन या दलाली का भुगतान किया गया।
यह आरोप सामने आने के बाद भारत में राजनीतिक विवाद तेज हो गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार पर भी इस सौदे को लेकर गंभीर सवाल उठे। मामले की जांच आगे बढ़ी और कई भारतीय तथा विदेशी नाम जांच के दायरे में आए।
64 करोड़ रुपये की कथित दलाली का आरोप
Bofors Scam में लगभग 64 करोड़ रुपये की कथित दलाली का आरोप प्रमुख रूप से सामने आया था। जांच एजेंसियों ने आरोप लगाया था कि रक्षा सौदे में बिचौलियों और अन्य लोगों के माध्यम से अवैध भुगतान किया गया।
इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सहित कई नेताओं, अधिकारियों और अन्य लोगों के नाम अलग-अलग चरणों में चर्चा में आए।
Bofors कंपनी के साथ-साथ इतालवी कारोबारी ओत्तावियो क्वात्रोची और हिंदुजा बंधुओं के नाम भी मामले में सामने आए थे।
हालांकि समय के साथ मामले में कई आरोप कमजोर हुए और विभिन्न आरोपियों को अदालतों से राहत मिलती गई।
हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ क्या आरोप थे?
Bofors Scam: श्रीचंद हिंदुजा, गोपीचंद हिंदुजा और प्रकाश हिंदुजा को बोफोर्स मामले में कथित वित्तीय लेनदेन और सौदे से जुड़े आरोपों के सिलसिले में आरोपी बनाया गया था।
लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट ने वर्ष 2005 में तीनों हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ आरोप समाप्त कर दिए। इसके बाद हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली कानूनी प्रक्रिया कई वर्षों तक चलती रही।
अब सुप्रीम कोर्ट की ताजा कार्रवाई के बाद हिंदुजा बंधुओं से जुड़ी यह आखिरी याचिका भी समाप्त हो गई है।
सुनवाई टालने की मांग क्यों नहीं मानी गई?
सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की ओर से सुनवाई स्थगित करने का अनुरोध किया गया था। एजेंसी की ओर से कहा गया कि मामला देर से सप्लीमेंट्री लिस्ट में आया था और इतने कम समय में मामले से जुड़े सभी निर्देश प्राप्त करना संभव नहीं हो सका।
अजय अग्रवाल ने भी अदालत को बताया कि आरोपमुक्त किए गए दो हिंदुजा बंधुओं की मृत्यु हो चुकी है और याचिका में पक्षकारों की सूची में बदलाव के लिए उन्हें समय चाहिए।
लेकिन अदालत ने मामले के करीब दो दशक से लंबित होने को ध्यान में रखते हुए इसे और टालने से इनकार कर दिया।
बोफोर्स मामले में अब क्या बचा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उपलब्ध जानकारी के अनुसार बोफोर्स खरीद से संबंधित कोई मामला किसी अदालत में लंबित नहीं है। यही वजह है कि इस फैसले को करीब चार दशक पुराने विवाद के कानूनी अध्याय के समापन के तौर पर देखा जा रहा है।
याचिकाकर्ता अजय अग्रवाल ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत आदेश आने के बाद वह आगे की कानूनी रणनीति पर विचार करेंगे। ऐसे में भविष्य में पुनर्विचार या अन्य कानूनी विकल्प अपनाए जाते हैं या नहीं, यह विस्तृत आदेश के बाद स्पष्ट होगा।
बोफोर्स ने क्यों बदली भारतीय राजनीति?
Bofors Scam का असर केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहा। इस मामले ने भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार, रक्षा सौदों में पारदर्शिता और बिचौलियों की भूमिका जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया।
1980 के दशक में सामने आया यह विवाद तत्कालीन सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया था। बोफोर्स का मुद्दा चुनावी राजनीति में भी लंबे समय तक प्रभावी रहा और इसके बाद रक्षा खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे।
चार दशक बाद खत्म हुआ कानूनी अध्याय
Bofors Scamकी शुरुआत को करीब 40 वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान मामले में जांच, आरोपपत्र, अदालतों की सुनवाई और अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं चलीं।
कई प्रमुख व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं हैं। हिंदुजा बंधुओं में भी केवल प्रकाश हिंदुजा के जीवित होने की बात रिपोर्ट में सामने आई है।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के साथ अब बोफोर्स खरीद से जुड़ी आखिरी लंबित याचिका भी समाप्त हो गई है।
निष्कर्ष
Bofors Scam भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित रक्षा सौदों में से एक रहा है। कथित दलाली और भ्रष्टाचार के आरोपों से शुरू हुआ यह विवाद दशकों तक राजनीतिक और कानूनी बहस का हिस्सा बना रहा।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा हिंदुजा बंधुओं से संबंधित आखिरी याचिका खारिज किए जाने के बाद इस मामले का न्यायिक अध्याय फिलहाल बंद हो गया है। हालांकि, बोफोर्स विवाद भारतीय राजनीति में पारदर्शिता, जवाबदेही और रक्षा सौदों से जुड़े सवालों की एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक मिसाल के रूप में लंबे समय तक चर्चा में रहेगा।




