The News Canvas Special: Thailand Cave Rescue Story: जून 2018 में थाईलैंड की थाम लुआंग गुफा में 12 बच्चे और उनका फुटबॉल कोच बाढ़ के पानी के बीच फंस गए थे। बाहर निकलने का रास्ता डूब चुका था, ऑक्सीजन घट रही थी और मानसून सिर पर था। फिर शुरू हुआ ऐसा अंतरराष्ट्रीय रेस्क्यू ऑपरेशन, जिसमें बच्चों को बेहोश करके पानी के भीतर से बाहर लाया गया। दुनिया ने सांस रोककर यह ऑपरेशन देखा—और 10 जुलाई को सभी 13 लोग सुरक्षित बाहर आ गए।
23 जून 2018: शाम को गुफा में गए, फिर बाहर नहीं लौटे… 23 जून 2018 को उत्तरी थाईलैंड के चियांग राय प्रांत में Wild Boars फुटबॉल टीम के 12 लड़के और उनके 25 वर्षीय सहायक कोच एक अभ्यास सत्र के बाद Tham Luang Nang Non गुफा में घूमने गए। लड़कों की उम्र लगभग 11 से 16 वर्ष के बीच थी। यह उनके लिए कोई अनजान जगह नहीं थी। लेकिन इस बार मौसम ने पूरा खेल बदल दिया। मानसूनी बारिश शुरू हुई और गुफा के रास्तों में तेजी से पानी भरने लगा। जिस रास्ते से वे अंदर गए थे, वही रास्ता बाहर आने से पहले पानी में डूब चुका था। बचने के लिए टीम बाहर की ओर नहीं, बल्कि और अंदर ऊंची जगह की तरफ बढ़ती चली गई। उधर देर शाम तक जब बच्चे घर नहीं पहुंचे तो परिवारों की चिंता बढ़ी। गुफा के बाहर उनकी साइकिलें मिलीं और यहीं से शुरू हुई वह तलाश, जिसने कुछ ही दिनों में पूरी दुनिया का ध्यान थाईलैंड की ओर खींच लिया।

एक ऐसी गुफा, जहां तैरना जानना भी काफी नहीं था
यह कोई सामान्य गुफा नहीं थी। थाम लुआंग की सुरंगें कई जगह बेहद संकरी हैं। कहीं पानी पूरी छत तक भर जाता है, कहीं रास्ता अचानक ऊपर-नीचे होता है और कहीं इतनी कम जगह बचती है कि गोताखोर को अपने ऑक्सीजन सिलेंडर तक उतारकर आगे बढ़ना पड़ सकता है। पानी साफ नहीं था। विजिबिलिटी कई हिस्सों में लगभग शून्य थी। और प्रवाह इतना तेज था कि दुनिया के अनुभवी cave divers के लिए भी अंदर जाना जान जोखिम में डालने जैसा था। इसीलिए सामान्य स्कूबा डाइविंग यहां काम नहीं आने वाली थी। Cave diving दुनिया की सबसे जोखिमभरी डाइविंग तकनीकों में गिनी जाती है, क्योंकि गोताखोर जरूरत पड़ने पर सीधे पानी की सतह पर नहीं लौट सकता। ऊपर सिर्फ चट्टान होती है।गलत मोड़ का मतलब—वापसी का रास्ता खो जाना।
नौ दिन तक दुनिया को नहीं पता था—बच्चे जिंदा भी हैं या नहीं

रेस्क्यू टीम लगातार पानी पंप करने, गुफा में आगे बढ़ने और दूसरे रास्ते तलाशने में जुटी थी। ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका समेत कई देशों से विशेषज्ञ बुलाए गए। लेकिन दिन गुजरते जा रहे थे। फिर 2 जुलाई 2018 को वह क्षण आया जिसका पूरी दुनिया इंतजार कर रही थी। ब्रिटिश केव डाइवर्स Rick Stanton और John Volanthen आखिरकार उस जगह पहुंचे जहां टीम फंसी हुई थी। अंधेरे में उनकी रोशनी पड़ी तो सामने बच्चे बैठे दिखाई दिए। सभी 12 बच्चे और उनका कोच जिंदा थे। उन्हें नौ दिनों बाद खोजा गया था। लेकिन यह राहत कुछ ही मिनटों की थी। क्योंकि अब सबसे बड़ा सवाल था— “उन्हें बाहर कैसे लाया जाए?”
मिल गए थे… लेकिन बाहर निकालना उससे भी बड़ी चुनौती थी

जिस रास्ते से विशेषज्ञ गोताखोर कई घंटों में बच्चों तक पहुंचे थे, वही रास्ता अनुभवहीन बच्चों को वापस तय करना था। उनमें से कई अच्छे तैराक भी नहीं थे। एक योजना यह थी कि उन्हें कुछ सप्ताह तक वहीं रखा जाए और मानसून खत्म होने का इंतजार किया जाए। लेकिन यह विकल्प भी खतरनाक था। गुफा में ऑक्सीजन का स्तर गिर रहा था और भारी बारिश किसी भी समय जलस्तर और बढ़ा सकती थी। दूसरी योजना थी कि पहाड़ में ऊपर से ड्रिलिंग की जाए। लेकिन बच्चों की सही लोकेशन तक सुरक्षित सुरंग बनाना समय और भूगोल—दोनों के लिहाज से बेहद मुश्किल था। एक छोटी सबमरीन जैसी व्यवस्था का प्रस्ताव भी सामने आया, लेकिन गुफा के संकरे और टेढ़े-मेढ़े रास्तों के लिए वह व्यावहारिक नहीं मानी गई। आखिरकार फैसला हुआ— उन्हें उसी रास्ते से पानी के भीतर निकालना होगा।
रेस्क्यू टीम को सबसे बड़ा डर बच्चों की घबराहट से था
इसी जगह ऑपरेशन ने एक असाधारण मोड़ लिया। कल्पना कीजिए— घुप्प अंधेरा। मटमैला पानी। चेहरे पर फुल-फेस मास्क। कई जगह शरीर जितना ही संकरा रास्ता। और घंटों तक पानी के नीचे से गुजरना। अगर इनमें से किसी बच्चे ने घबराकर मास्क हटा दिया या हाथ-पैर मारने शुरू कर दिए, तो सिर्फ उसकी ही नहीं, उसे लेकर चल रहे गोताखोर की जान भी खतरे में पड़ सकती थी। ऑस्ट्रेलियाई एनेस्थेटिस्ट और अनुभवी cave diver Dr Richard “Harry” Harris को बुलाया गया। उनके सामने सवाल था— क्या बच्चों को sedate करके बाहर निकाला जा सकता है? शुरुआत में उन्हें यह योजना बेहद जोखिमभरी लगी। लेकिन जब दूसरे विकल्प लगभग खत्म हो गए तो sedation plan को ही अपनाया गया।
बच्चों को ‘सुलाकर’ बाहर निकालने की योजना
यहीं से यह रेस्क्यू दुनिया के सबसे असामान्य rescue operations में शामिल हो गया। डॉ. हैरिस बच्चों की मेडिकल जांच करते और उन्हें sedation देते। उन्हें ketamine आधारित anaesthesia दिया गया ताकि वे बाहर लाए जाते वक्त panic न करें। दवा का असर पूरे रास्ते के लिए पर्याप्त नहीं था, इसलिए दूसरे प्रशिक्षित divers को जरूरत पड़ने पर sedation दोबारा देने का तरीका भी सिखाया गया। डॉ. हैरिस ने बाद में बताया कि हर बच्चे को रास्ते में अलग-अलग समय पर फिर से sedation की जरूरत पड़ी। बच्चों के चेहरे पर full-face breathing mask लगाए गए। इसके बाद विशेषज्ञ गोताखोर उन्हें अपने साथ लेकर संकरे, पानी से भरे रास्तों से बाहर की ओर बढ़े। इस दौरान बच्चे सक्रिय रूप से तैर नहीं रहे थे। वास्तव में पूरी जिम्मेदारी rescuers पर थी। ABC से बातचीत में Craig Challen ने कहा था कि sedation जरूरी थी, क्योंकि panic होने पर पूरा ऑपरेशन जानलेवा हो सकता था।
हर बच्चे को बाहर निकालना घंटों का मिशन था
गुफा के कई हिस्से पूरी तरह पानी में डूबे थे। कुछ हिस्सों में बच्चे को गोताखोर के शरीर के करीब पकड़कर खींचा गया। जहां पानी कम हुआ, वहां stretcher जैसी व्यवस्थाओं और दूसरे rescuers की मदद से उन्हें आगे बढ़ाया गया। पूरे रास्ते में guide ropes लगाई गई थीं ताकि शून्य दृश्यता में divers दिशा न खो दें। यह ऐसा ऑपरेशन था जिसमें गलती की गुंजाइश लगभग नहीं थी। एक breathing mask leak हुआ—खतरा। दवा का असर गलत पड़ा— खतरा। रस्सी छूटी— खतरा। अचानक पानी बढ़ा— खतरा।…………. यानी हर बच्चे को बाहर लाते वक्त पूरी rescue chain की परीक्षा हो रही थी।
इस ऑपरेशन ने एक जान भी ली
इस सफलता की कहानी के बीच एक बड़ी त्रासदी भी हुई। पूर्व Thai Navy SEAL Saman Kunan गुफा के भीतर ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचाने के मिशन के दौरान अपनी जान गंवा बैठे। आज थाम लुआंग गुफा के पास उनकी प्रतिमा उस ऑपरेशन में दिए गए बलिदान की याद दिलाती है। उनकी मौत ने rescuers को यह और स्पष्ट कर दिया था कि यह मिशन कितनी पतली रेखा पर चल रहा है। अगर एक प्रशिक्षित diver तक इस वातावरण में सुरक्षित नहीं था, तो 11-16 साल के बच्चों को बाहर लाना कितना खतरनाक होगा—इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
फिर शुरू हुआ दुनिया की सांस रोक देने वाला Final Rescue
8 जुलाई 2018 को extraction mission शुरू हुआ। पहले दिन चार बच्चों को बाहर निकाला गया। अगले दिन चार और। और 10 जुलाई को बाकी चार बच्चों तथा कोच को सुरक्षित बाहर लाया गया। तीन दिनों में कुल 12 बच्चे और उनका कोच—सभी 13 लोग सुरक्षित बाहर थे। जिस ऑपरेशन को शुरू करने से पहले experienced rescuers खुद यह नहीं जानते थे कि सभी बच्चे जिंदा निकल पाएंगे या नहीं, वह बिना किसी trapped member की मौत के पूरा हो गया।
लेकिन बच्चे नौ दिन तक जिंदा कैसे रहे?
यह कहानी सिर्फ rescue technology की नहीं, survival की भी है। बच्चे गुफा में एक ऊंची जगह पर रुके रहे। उन्होंने अपनी ऊर्जा बचाई। कोच Ekapol Chanthawong, जो पहले बौद्ध मठ में रह चुके थे, ने बच्चों को शांत रहने और breathing control में मदद करने के लिए meditation techniques करवाईं—यह बात बाद में इस पूरे घटनाक्रम से जुड़ी प्रमुख रिपोर्टों में सामने आई। बच्चों के पास शुरुआती दिनों में पर्याप्त खाना नहीं था। उन्होंने उपलब्ध पानी और गुफा में टपकते पानी के सहारे खुद को जिंदा रखा। लेकिन शायद सबसे बड़ी चीज थी— panic से बचना। गुफा के बाहर पूरी दुनिया बेचैन थी, लेकिन अंदर बच्चों को अपनी सांसें और उम्मीद दोनों बचाकर रखनी थीं।
भारत भी इस मिशन का हिस्सा था
थाईलैंड का यह rescue operation अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण बना। कई देशों के divers, engineers, doctors, military personnel और volunteers इसमें शामिल हुए। भारत से भी तकनीकी सहायता पहुंची। भारतीय pump manufacturer Kirloskar Brothers से जुड़े विशेषज्ञों और pumping solutions ने पानी निकालने के प्रयासों में सहयोग किया। पूरे मिशन में pumping इसलिए बेहद अहम थी क्योंकि जितना पानी कम होता, divers के लिए रास्ता उतना ही manageable बनता।
18 दिन बाद खत्म हुआ इंतजार
23 जून को जो लड़के सामान्य-सी शाम में फुटबॉल अभ्यास के बाद गुफा घूमने गए थे, शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि अगले 18 दिन उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाले हैं। पहले वे बारिश से भागे। फिर अंधेरे से लड़े। फिर भूख से। फिर घटती ऑक्सीजन से। और अंत में उन्हें बाहर निकालने के लिए इंसानी ingenuity ने ऐसा तरीका अपनाया, जिसे सामान्य परिस्थितियों में शायद कोई डॉक्टर या rescue commander कभी स्वीकार ही न करता। लेकिन हालात सामान्य नहीं थे। और शायद इसलिए इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश technology नहीं, teamwork था। British cave divers ने बच्चों को खोजा। Thai Navy SEALs ने गुफा के भीतर logistics संभाली। ऑस्ट्रेलियाई medical divers ने extraction plan को संभव बनाया। सैकड़ों स्थानीय volunteers ने बाहर काम किया। इंजीनियर पानी निकालते रहे। डॉक्टर अस्पतालों में इंतजार करते रहे। और तीन दिनों तक एक के बाद एक बच्चे अंधेरी गुफा से रोशनी में लौटते रहे। 10 जुलाई 2018 को जब आखिरी सदस्य बाहर आया, तब यह सिर्फ थाईलैंड की जीत नहीं थी। यह उस बात का सबूत था कि जब विज्ञान, साहस, अनुभव और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग एक लक्ष्य के लिए साथ खड़े हों— तो कभी-कभी “असंभव” भी सिर्फ एक मुश्किल rescue plan बनकर रह जाता है।

