के. सी. वेणुगोपाल ने लोकसभा अध्यक्ष को भेजे नोटिस में कहा कि केंद्रीय मंत्री ने छात्र आंदोलन के दौरान कथित पैलेट गन इस्तेमाल पर गलत जानकारी दी। अब नोटिस स्वीकार करना है या नहीं, इसका फैसला लोकसभा अध्यक्ष करेंगे।
नई दिल्ली। कांग्रेस सांसद और लोकसभा की लोक लेखा समिति के अध्यक्ष के. सी. वेणुगोपाल ने केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही शुरू करने की मांग की है। वेणुगोपाल ने शुक्रवार, 31 जुलाई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष को नोटिस देकर आरोप लगाया कि मंत्री ने दिल्ली में आंदोलनकारी विद्यार्थियों के खिलाफ हुई कार्रवाई के संबंध में सदन को गुमराह किया।
वेणुगोपाल का आरोप है कि 29 जुलाई को लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा के दौरान जितेंद्र सिंह ने कहा था कि प्रदर्शनकारियों पर कोई फायरिंग नहीं हुई और केवल आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस सांसद ने इस बयान को उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड, मीडिया रिपोर्टों और पैलेट से घायल होने का दावा करने वाले प्रदर्शनकारियों के विवरण के विपरीत बताया है।

‘प्रस्ताव पारित’ नहीं, अभी केवल नोटिस दिया गया
मूल कॉपी के शीर्षक में जितेंद्र सिंह के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश किए जाने की बात कही गई है। संसदीय प्रक्रिया की दृष्टि से अधिक सटीक स्थिति यह है कि वेणुगोपाल ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस लोकसभा अध्यक्ष को सौंपा है। नोटिस देने मात्र से प्रस्ताव सदन में स्वीकार या पारित नहीं माना जाता।
लोकसभा के नियम 222 के अनुसार कोई सदस्य सदन, उसकी समिति या किसी सदस्य के विशेषाधिकार हनन का प्रश्न अध्यक्ष की सहमति से उठा सकता है। इसलिए अगला निर्णय लोकसभा अध्यक्ष का होगा कि मामला प्रथमदृष्टया विशेषाधिकार का बनता है या नहीं। अध्यक्ष अनुमति देने, नोटिस अस्वीकार करने अथवा इसे विशेषाधिकार समिति को भेजने का निर्णय ले सकते हैं।
जितेंद्र सिंह ने सदन में क्या कहा था?
वेणुगोपाल के नोटिस के अनुसार जितेंद्र सिंह ने चर्चा का जवाब देते हुए कहा था कि किसी तरह की फायरिंग नहीं हुई, केवल आंसू गैस का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि जब गोली चली ही नहीं तो गोली चलाने का आदेश किसने दिया, यह सवाल नहीं उठता।
मंत्री ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा विद्यार्थियों पर पैलेट गन इस्तेमाल किए जाने के आरोप को खारिज किया था। उन्होंने कहा था कि बल प्रयोग से संबंधित मौके के फैसले मजिस्ट्रेट और संबंधित अधिकारी लेते हैं, न कि सीधे कोई मंत्री।
कांग्रेस ने किन साक्ष्यों का हवाला दिया?
वेणुगोपाल ने दावा किया कि राहुल गांधी मीडिया की मौजूदगी में पैलेट से घायल एक प्रदर्शनकारी से मिले थे। उन्होंने कहा कि घायल लोगों से संबंधित अस्पताल रिकॉर्ड, तस्वीरें और कई मीडिया रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। कांग्रेस का तर्क है कि ऐसी स्थिति में सदन में स्पष्ट रूप से “कोई फायरिंग नहीं हुई” कहना तथ्यों को छिपाने के समान है।
हालांकि इन दावों पर अभी किसी संसदीय समिति या अदालत ने अंतिम तथ्यात्मक निष्कर्ष नहीं दिया है। यह भी तय होना बाकी है कि मंत्री ने “फायरिंग” शब्द का प्रयोग सामान्य गोलियों के संदर्भ में किया था या उनके बयान में पैलेट गन से छोड़े गए प्रोजेक्टाइल भी शामिल थे।
यही तकनीकी अंतर इस विवाद के केंद्र में है। सरकार के प्रतिनिधियों ने “गोलीबारी नहीं हुई” कहा है, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष का दावा है कि पंप-एक्शन गन से धातु के पैलेट चलाए गए थे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से बढ़े सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने 30 जुलाई को इस विवाद से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र को 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान तैनात Rapid Action Force का हथियार और गोला-बारूद रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश दिया। अदालत ने पैलेट गन के इस्तेमाल को नियंत्रित करने वाले Standing Orders और Standard Operating Procedures भी रिकॉर्ड पर रखने को कहा है।
शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार को कथित पैलेट चोटों से प्रभावित याचिकाकर्ताओं और समान स्थिति वाले अन्य घायलों का पूरा इलाज सुनिश्चित करने का निर्देश भी दिया। हालांकि अदालत ने अभी यह अंतिम रूप से निर्धारित नहीं किया है कि प्रदर्शन में पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था या उसका इस्तेमाल वैध और आनुपातिक था।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा ammunition log और मेडिकल इलाज पर दिए गए निर्देश कांग्रेस के उस तर्क को बल देते हैं कि मामले में जांच योग्य तथ्य मौजूद हैं। दूसरी तरफ अदालत ने पैलेट गन पर तत्काल पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को अस्पष्ट बताया और कहा कि मौजूदा नियम असाधारण परिस्थितियों में इसके उपयोग की अनुमति देते हैं।
CRPF की समीक्षा में पैलेट इस्तेमाल की बात
20 जुलाई की कार्रवाई के बाद तैयार CRPF की कथित Post-Event Analysis Report से संबंधित मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि भीड़ नियंत्रण के दौरान पैलेट गन जैसे “Non-Lethal” साधनों का इस्तेमाल अधिकृत था और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया। यदि आधिकारिक रिकॉर्ड में यह बात प्रमाणित होती है तो “कोई फायरिंग नहीं हुई” वाले बयान की व्याख्या इस विशेषाधिकार विवाद में महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिर भी CRPF की आंतरिक समीक्षा का यह दावा अलग प्रश्न है कि कार्रवाई नियमों के अनुरूप थी या नहीं। विशेषाधिकार नोटिस में मुख्य प्रश्न यह रहेगा कि मंत्री ने सदन को तथ्यात्मक रूप से गलत या अधूरी जानकारी दी और क्या ऐसा जानबूझकर किया गया।
जानबूझकर सदन को गुमराह करना साबित करना होगा
किसी मंत्री के गलत बयान और विशेषाधिकार हनन के बीच कानूनी तथा संसदीय अंतर होता है। यदि बयान अनजाने में गलत तथ्य पर आधारित हो तो मंत्री स्पष्टीकरण या सुधार दे सकता है। गंभीर विशेषाधिकार मामला तब बनता है, जब यह स्थापित हो कि जानकारी जानबूझकर गलत दी गई या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए गए।
इसलिए संभावित जांच में जितेंद्र सिंह के बयान का पूरा संदर्भ, गृह मंत्रालय और सुरक्षा बलों की रिपोर्ट, RAF का ammunition log, पुलिस के आदेश, मेडिकल रिकॉर्ड और वीडियो सामग्री देखी जा सकती है।
अब आगे क्या होगा?
लोकसभा अध्यक्ष पहले नोटिस की स्वीकार्यता पर विचार करेंगे। अध्यक्ष को मामला प्रथमदृष्टया विशेषाधिकार हनन का लगने पर इसे सदन में उठाने की अनुमति दी जा सकती है या विशेषाधिकार समिति को जांच के लिए भेजा जा सकता है। समिति संबंधित मंत्री, नोटिस देने वाले सांसद और दूसरे अधिकारियों से जवाब तथा दस्तावेज मांग सकती है।
समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा को सौंपती है और किसी चेतावनी, फटकार या दूसरी संसदीय कार्रवाई पर अंतिम फैसला सदन करता है। फिलहाल लोकसभा अध्यक्ष द्वारा नोटिस स्वीकार किए जाने या जितेंद्र सिंह से जवाब मांगने की औपचारिक सूचना सामने नहीं आई है।
संसद में आमने-सामने सरकार और विपक्ष
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब छात्र आंदोलन और पैलेट गन विवाद पर सरकार तथा विपक्ष के बीच लगातार टकराव चल रहा है। कांग्रेस गृह मंत्री अमित शाह और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग कर रही है, जबकि सरकार का कहना है कि विपक्ष अपुष्ट आरोपों के आधार पर राजनीतिक विवाद खड़ा कर रहा है।
एक दिन पहले भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने भी राहुल गांधी के लोकसभा भाषण को लेकर उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया था। इस तरह छात्र आंदोलन का विवाद अब सड़क और अदालत के साथ संसदीय विशेषाधिकार की कार्यवाही तक पहुंच गया है।




