राज्यसभा में लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्ष के नेता ने लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन के कथित इस्तेमाल की जवाबदेही तय करने की मांग की। सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र जांच, वार्षिक परीक्षा कैलेंडर और सरकारी रिक्त पदों पर भर्ती का मुद्दा भी उठाया।
नई दिल्ली। राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने दिल्ली में पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग की है। खरगे ने आरोप लगाया कि छात्र प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज, आंसू गैस और पैलेट गन का कथित इस्तेमाल हुआ तथा इस पूरी कार्रवाई की राजनीतिक और प्रशासनिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
खरगे गुरुवार, 30 जुलाई को राज्यसभा में लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा की शुरुआत कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने प्रस्तावित कानून की सख्ती से अधिक परीक्षा व्यवस्था की प्रशासनिक विफलताओं, पेपर लीक की रोकथाम और प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ व्यवहार पर सवाल उठाए।
अमित शाह से पूछे कार्रवाई से जुड़े सवाल
खरगे ने सदन में पूछा कि विद्यार्थियों पर लाठीचार्ज करने, आंसू गैस छोड़ने और कथित रूप से पैलेट गन इस्तेमाल करने का आदेश किसने दिया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि प्रदर्शन के दौरान सादे कपड़ों में छात्रों की पिटाई करने वाले लोग कौन थे और कार्रवाई की कमान किस अधिकारी के पास थी।
उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है, जबकि प्रदर्शन स्थल पर तैनात Rapid Action Force, CRPF का विशेष दंगा नियंत्रण बल है। खरगे का तर्क था कि गृह मंत्री को संसद में उपस्थित होकर कार्रवाई से संबंधित सवालों का जवाब देना चाहिए। जवाब नहीं देने की स्थिति में उन्हें इस्तीफा देना चाहिए और ऐसा नहीं करने पर प्रधानमंत्री को उन्हें मंत्रिमंडल से हटाना चाहिए। यह कांग्रेस नेता की राजनीतिक मांग है; कार्रवाई के आदेश को लेकर किसी न्यायिक जांच ने अभी गृह मंत्री की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय नहीं की है।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग
खरगे ने छात्र प्रदर्शन के दौरान कथित पुलिस ज्यादती की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच कराने की मांग की। उन्होंने कहा कि केवल विभागीय जांच से यह स्पष्ट नहीं होगा कि किस परिस्थिति में कौन-से हथियार इस्तेमाल किए गए और क्या कार्रवाई निर्धारित नियमों के अनुरूप थी।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने 30 जुलाई को पैलेट गन के कथित इस्तेमाल से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को प्रदर्शन के दौरान तैनात RAF का ammunition log सुरक्षित रखने को कहा है। अदालत ने दिल्ली सरकार को पैलेट जैसी चोटों से प्रभावित प्रदर्शनकारियों के समुचित इलाज का निर्देश भी दिया।
शीर्ष अदालत ने पैलेट गन पर देशव्यापी पूर्ण प्रतिबंध की मांग को मौजूदा स्वरूप में अस्पष्ट बताया और कहा कि पुलिस नियम असाधारण परिस्थितियों में ऐसे साधनों के इस्तेमाल की अनुमति दे सकते हैं। हालांकि अदालत ने 20 जुलाई की कार्रवाई को वैध घोषित नहीं किया है और वह उस दिन पैलेट के कथित इस्तेमाल की जांच के लिए तैयार है।
घायल छात्रों को लेकर खरगे ने किए गंभीर दावे
खरगे ने सदन में दावा किया कि पुलिस कार्रवाई के कारण कई छात्र अस्पतालों में भर्ती हुए, कुछ के हाथ-पैर टूटे और एक छात्र की आंख की रोशनी चली गई। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी विद्यार्थियों के शरीर और आंखों में पैलेट के छर्रे मिले हैं। ये दावे कांग्रेस नेता के भाषण का हिस्सा हैं; प्रत्येक घायल की स्थिति और चोट के कारणों का पूरा आधिकारिक चिकित्सा विवरण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
पैलेट से घायल होने का दावा करने वाले प्रदर्शनकारियों की याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा इलाज और गोला-बारूद रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के निर्देश से यह स्पष्ट है कि इस्तेमाल किए गए बल और हथियारों का प्रश्न अभी न्यायिक परीक्षण के दायरे में है।
BJP ने आरोपों को किया खारिज
BJP ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए कहा है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा गोली चलाने का दावा गलत है। पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि भीड़ नियंत्रण के दौरान मौके पर मौजूद मजिस्ट्रेट परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेते हैं और गृह मंत्री सीधे ऐसे आदेश जारी नहीं करते।
हालांकि इस विवाद में सामान्य गोलीबारी और पंप-एक्शन गन से पैलेट दागे जाने के बीच तकनीकी अंतर भी महत्वपूर्ण है। इसलिए केवल यह कहना कि “गोली नहीं चली” पैलेट के कथित इस्तेमाल से जुड़े सवाल का स्वतः उत्तर नहीं देता। RAF का ammunition log, मेडिकल रिकॉर्ड, वीडियो फुटेज और अधिकारियों की रिपोर्ट ही इस्तेमाल किए गए साधनों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।
संशोधन विधेयक को बताया अपर्याप्त
खरगे ने कहा कि केवल जेल की अवधि और जुर्माना बढ़ाने से पेपर लीक की समस्या समाप्त नहीं होगी। उनके अनुसार कानून अपराध होने के बाद सजा दे सकता है, लेकिन प्रश्नपत्र लीक होने से पहले उसे रोकने के लिए सुरक्षित तकनीक, जवाबदेह संस्थाएं, प्रशिक्षित कर्मचारी और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था जरूरी है।
सरकार का कहना है कि संशोधन विधेयक सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता मजबूत करेगा। प्रस्तावित कानून में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने वाले व्यक्तियों के लिए अधिकतम सजा 10 वर्ष और जुर्माना 50 लाख रुपये तक करने का प्रावधान है। संगठित परीक्षा अपराध में अधिकतम जुर्माना 10 करोड़ रुपये तक हो सकता है।
सेवा प्रदाताओं के लिए जुर्माना पांच करोड़ रुपये तक बढ़ाने, परीक्षा संचालन से आठ वर्ष तक प्रतिबंधित करने, Special Task Force गठित करने और विशेष Fast-Track Courts बनाने का प्रस्ताव भी विधेयक में शामिल है। जांच दो महीने में और मुकदमे की कार्यवाही तीन महीने में पूरी करने की समयसीमा प्रस्तावित की गई है।
यह विधेयक 27 जुलाई को लोकसभा में पेश किया गया था और 29 जुलाई को निचले सदन से पारित हुआ। 30 जुलाई को राज्यसभा में इस पर चर्चा हुई।
वार्षिक परीक्षा कैलेंडर बनाने की मांग
खरगे ने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाओं के लिए निश्चित Annual Examination Calendar बनाने की मांग की। उन्होंने कहा कि परीक्षाओं की तारीख, परिणाम और भर्ती प्रक्रिया के लिए स्पष्ट समयसीमा होने से सरकार तथा परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तय की जा सकेगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि परीक्षाएं स्थगित होने, परिणामों में देरी और भर्तियां वर्षों तक लंबित रहने से युवाओं का समय और पैसा दोनों बर्बाद होते हैं। खरगे ने परीक्षा रद्द होने पर अभ्यर्थियों को होने वाले आर्थिक और मानसिक नुकसान की भरपाई के लिए भी जवाबदेही तय करने की आवश्यकता बताई।
सरकारी रिक्त पद भरने का मुद्दा उठाया
खरगे ने केंद्र सरकार से संसद के सामने National Youth Employment Strategy पेश करने की मांग की। उन्होंने दावा किया कि केंद्र सरकार और सरकारी संस्थानों में लाखों पद खाली हैं, जिन्हें जल्द भरा जाना चाहिए। उन्होंने निवेश और रोजगार सृजन के लिए दीर्घकालीन योजना बनाने पर भी जोर दिया।
भाषण के दौरान खरगे ने करीब 30 लाख सरकारी पद खाली होने, पिछले दस वर्षों में 152 पेपर लीक और लगभग 1.25 लाख विद्यार्थियों की आत्महत्या जैसे आंकड़े भी रखे। ये विपक्ष की ओर से प्रस्तुत आंकड़े हैं। इन सभी संख्याओं की परिभाषा, समयावधि और स्रोत एक समान नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्वतंत्र आधिकारिक सत्यापन के बिना स्थापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सरकार ने कानून को बताया ‘Zero Tolerance’ का प्रमाण
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने राज्यसभा में कहा कि संशोधन विधेयक परीक्षा संबंधी अपराधों के प्रति सरकार की Zero Tolerance नीति को दिखाता है। सरकार का तर्क है कि सख्त दंड, समयबद्ध जांच, विशेष अदालतों और संगठित गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई से परीक्षा प्रणाली में विश्वास बहाल होगा।
सरकार ने यह भी कहा कि 2024 का मूल कानून UPSC, SSC, Railway Recruitment Boards, IBPS और NTA सहित केंद्र की प्रमुख परीक्षा एजेंसियों को कवर करता है। नया संशोधन इसके क्रियान्वयन के दौरान सामने आए अनुभवों के आधार पर दंड और जांच व्यवस्था को अधिक कठोर बनाता है।
कानून और व्यवस्था पर दोहरी बहस
राज्यसभा की चर्चा में दो अलग लेकिन जुड़े हुए मुद्दे सामने आए। पहला प्रश्न यह है कि पेपर लीक रोकने के लिए प्रस्तावित कानून कितना प्रभावी होगा। दूसरा प्रश्न यह है कि परीक्षा व्यवस्था से नाराज होकर सड़कों पर उतरे विद्यार्थियों के खिलाफ इस्तेमाल किया गया बल आवश्यक और आनुपातिक था या नहीं।
पहले प्रश्न पर संसद कानून बनाएगी, लेकिन दूसरे प्रश्न का उत्तर निष्पक्ष जांच, चिकित्सा रिपोर्ट, वीडियो और सुरक्षाबलों के रिकॉर्ड से ही सामने आएगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा RAF का ammunition log सुरक्षित रखने का आदेश इसी तथ्यात्मक जांच के लिए महत्वपूर्ण है।
फिलहाल Kharge Demands Amit Shah Resignation का मुद्दा संसद में सरकार और विपक्ष के बीच बड़े राजनीतिक टकराव में बदल गया है। कांग्रेस गृह मंत्री की जवाबदेही और न्यायिक निगरानी में जांच की मांग कर रही है, जबकि सरकार परीक्षा सुधार कानून और स्थापित भीड़ नियंत्रण प्रक्रिया का हवाला दे रही है। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।




