मद्रास हाईकोर्ट ने 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के आरोपों में दर्ज अलग-अलग मामले निरस्त किए; माणिकम टैगोर के मामले में अधिकृत लोक सेवक की लिखित शिकायत नहीं होने का दिया गया था तर्क
चेन्नई। मद्रास उच्च न्यायालय ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान आदर्श चुनाव आचार संहिता के कथित उल्लंघन से जुड़े दो अलग-अलग मामलों को रद्द कर दिया है। ये मामले विरुधुनगर से कांग्रेस सांसद बी. माणिकम टैगोर और तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन के खिलाफ दर्ज किए गए थे।
न्यायमूर्ति जी.के. इलानथिरैयन ने दोनों नेताओं की ओर से दाखिल अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने का आदेश दिया। माणिकम टैगोर के खिलाफ विरुधुनगर पश्चिम पुलिस और नैनार नागेंद्रन के खिलाफ तिरुनेलवेली पुलिस ने मामले दर्ज किए थे।
प्रचार अवधि समाप्त होने के बाद Facebook पोस्ट का आरोप
माणिकम टैगोर ने 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में विरुधुनगर संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। इस सीट पर 19 अप्रैल 2024 को मतदान हुआ था और टैगोर चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे थे।
पुलिस की ओर से दर्ज मामले में आरोप लगाया गया था कि मतदान से पहले चुनाव प्रचार की निर्धारित अवधि समाप्त होने के बावजूद टैगोर ने 18 अप्रैल को अपने Facebook अकाउंट के माध्यम से प्रचार सामग्री साझा की थी। इसी आधार पर उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 188 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 126 मतदान समाप्त होने के निर्धारित समय से पहले 48 घंटे की प्रचार-निषेध अवधि का प्रावधान करती है। चुनाव आयोग के दिशा-निर्देश डिजिटल और सोशल मीडिया पर प्रसारित चुनावी सामग्री को भी इस अवधि के दायरे में रखते हैं।
लिखित शिकायत नहीं होने का दिया तर्क
माणिकम टैगोर ने मामला रद्द कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि IPC की धारा 188 से जुड़े अपराध में अदालत तभी संज्ञान ले सकती है, जब संबंधित लोक सेवक या उसके अधिकृत अधिकारी की ओर से लिखित शिकायत प्रस्तुत की गई हो।
टैगोर का कहना था कि उनके मामले में इस अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। अदालत ने उनकी दलील स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज मामले और उससे जुड़ी कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के अनुसार IPC की धाराओं 172 से 188 तक के अपराधों पर किसी न्यायालय द्वारा संज्ञान लेने के लिए संबंधित लोक सेवक या उसके प्रशासनिक वरिष्ठ की लिखित शिकायत आवश्यक होती है। यहां कानूनी तौर पर अधिक सटीक बात यह है कि यह प्रावधान अदालत के संज्ञान लेने पर रोक लगाता है; इसे केवल FIR दर्ज करने की सामान्य मनाही के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
IPC और भारतीय न्याय संहिता में अंतर
मूल विवरण में IPC को भारतीय न्याय संहिता लिखा गया है, जो सही नहीं है। IPC का पूरा नाम Indian Penal Code या भारतीय दंड संहिता, 1860 है।
भारतीय न्याय संहिता यानी BNS अलग कानून है, जो 1 जुलाई 2024 से लागू हुआ। चूंकि टैगोर के खिलाफ आरोपित घटना अप्रैल 2024 की थी, इसलिए मामले में उस समय लागू IPC और दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों का उल्लेख किया गया।
नागेंद्रन के खिलाफ मामला भी निरस्त
नैनार नागेंद्रन ने 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के रूप में तिरुनेलवेली सीट से चुनाव लड़ा था। चुनाव के दौरान आचार संहिता के कथित उल्लंघन को लेकर तिरुनेलवेली पुलिस ने उनके खिलाफ भी मामला दर्ज किया था।
यह मामला स्थानीय अदालत के सामने लंबित था। नागेंद्रन ने कार्यवाही रद्द कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया। न्यायमूर्ति इलानथिरैयन ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामला भी निरस्त कर दिया।
उपलब्ध रिपोर्ट में नागेंद्रन के मामले की कथित घटना और मामला रद्द करने का विस्तृत कानूनी आधार सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है। इसलिए दोनों मामलों को बिल्कुल समान तथ्यों वाला बताना उचित नहीं होगा।
आरोप सही या गलत होने पर फैसला नहीं
Madras High Court Election Case में आपराधिक कार्यवाही रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने विस्तृत साक्ष्य परीक्षण के बाद कथित आचार संहिता उल्लंघन को सही या गलत घोषित कर दिया।
माणिकम टैगोर के मामले में उपलब्ध जानकारी के अनुसार अदालत का आदेश मुख्य रूप से जरूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं होने से जुड़ा था। ऐसी स्थिति में मामले का निरस्तीकरण आरोपों की मेरिट पर दोषमुक्त किए जाने से अलग होता है।
यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत अपराध और IPC की धारा 188 के तहत सरकारी आदेश की अवज्ञा अलग-अलग कानूनी पहलू हो सकते हैं। प्रत्येक मामले में लागू धाराओं और प्रक्रिया का अलग परीक्षण आवश्यक होता है।
चुनावी मामलों में प्रक्रिया का पालन जरूरी
मद्रास हाईकोर्ट का फैसला यह रेखांकित करता है कि चुनाव के दौरान नियमों का पालन जितना जरूरी है, उतना ही महत्वपूर्ण कथित उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई करते समय निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना भी है।
पुलिस और चुनाव अधिकारियों को शिकायत दर्ज करने, सक्षम अधिकारी की अनुमति लेने, लिखित शिकायत प्रस्तुत करने और अदालत में आरोपपत्र दाखिल करने से जुड़ी सभी औपचारिकताओं को पूरा करना होता है। किसी अनिवार्य प्रक्रिया की अनदेखी होने पर गंभीर आरोपों से जुड़ी कार्यवाही भी अदालत में टिक नहीं पाती।
Madras High Court Election Case में कांग्रेस और भाजपा के दोनों नेताओं को राहत मिली है। अदालत ने माणिकम टैगोर के खिलाफ विरुधुनगर में दर्ज मामला तथा नैनार नागेंद्रन के खिलाफ तिरुनेलवेली में लंबित कार्यवाही रद्द कर दी है।




